2012- pilibheet ki ghatna.(वर्ष २०१२ पीलीभीत की एक घटना )

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sexy
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Re: 2012- pilibheet ki ghatna.(वर्ष २०१२ पीलीभीत की एक घटना

Unread post by sexy » 19 Aug 2015 07:47

उस रात हमने वो संग लायी हुई मदिरा भी उड़ा डाली! मदिरा का सर्व-हरण करने में हम कभी नहीं चूकते! और चूकना भी नहीं चाहिए! बाबा गिरि ने भी हमारे साथ दो-चार पैग ले लिए थे, उनका वैसे सारा कार्यक्रम बाबा अमर नाथ के संग ही होता था! तो हम, रात को ओये आराम से, और सुकून से सुबह उठ भी गए! नहाये-धोये, चाय-नाश्ता किया, टहल भी आये! इसमें करीब आठ साढ़े आठ बज चुके थे! उसके बाद हमने आराम किया, शर्मा जी अकेले टहलने गए थे और साथ में लोकाट ले आये थे! दरअसल लोकाट पेट के लिए बहुत फायदेमंद हुआ करता है, लोकाट के बीजों को सुखाकर, उनका चूर्ण बना लें तो कब्ज़ और पेट की सभी बीमारियों का नाश किया करता है! और फल के रूप में खाओ तो भी पेट के लिए औषधि का काम करता है! जब से शर्मा जी ने लोकाट खाए थे तब से उनका पेट साफ़ और बढ़िया हो गया था! इसीलिए लाने गए थे! मैं उस समय लेट कर आराम कर रहा था! तभी वे ले आये एक बड़ा सा गुच्छा! उसको साफ़ करने के लिए गुसलखाने गए, और एक एक करके साफ़ कर लिए! और ले आये मेरे पास!
"लो जी" वे बोले,
"आप खाओ" मैंने कहा,
"खाओ तो सही?" वे बोले,
"आप खाओ" मैंने कहा,
"नहीं खाएंगे?" पूछा उन्होंने,
"खा लूँगा" मैंने कहा,
"तो उठिए फिर" बोले वो,
आखिर उठना पड़ा,
"लाओ" मैंने कहा,
"लो" मुझे देते हुए बोले,
मैंने फल छीले और खाने लगा! वाक़ई में बहुत मीठे चुन कर लाये थे! हम खाते रहे जब तक खत्म नहीं हो गए! जब खत्म हुए तो हाथ-मुंह धोने चले हम! वापिस आये तो बाबा गिरि मिले हमें वहीँ कमरे में! नमस्कार हुई!
"आइए मेरे साथ" बोले वो,
"चलिए" मैंने कहा,
और चला बाहर उनके साथ,
वे मुझे एक तरफ दूसरे स्थान की तरफ ले चले, मैं चलता रहा, हम पहुँच गए, तो वहां एक महिला खड़ी थी, एक कमरे के बाहर, कोई पचास-पचपन की रही होगी, उसने नमस्कार की, तो मैंने भी की,
"अंदर आओ" वे बोले,
मैं अंदर चला,
अंदर आया तो एक लड़की बैठी थी वहां, शायद यही थी वो साध्वी, जिसका ज़िक्र कल किया था बाबा ने!
"ये है रचना" बोले बाबा,
उसने नमस्कार किया, मैंने उत्तर दिया,
मैं बैठ गया था वहाँ कुर्सी पर, अब स्पष्ट था वो महिला या तो कोई पूर्व-साध्वी थी, अथवा इस लड़की की माँ,
"रचना" मैंने कहा,
उसने मुझे देखा, शर्मा कर निगाहें नीचे कर लीं उसने, मैं समझ गया, ये शायद पहली बार ही किसी क्रिया में बैठने आई है, और ये मेरे लिए सही नहीं था, ये मेरे लिए समस्या बन सकती थी! मैंने उस से अकेले में बात करने की कही, तो बाबा मान गए, वो उस महिला को लेकर बाहर चले गए, हालांकि उस महिला को ऐसा करना ठीक नहीं लगा था, उसके हाव-भाव ऐसे ही थे! वे चले गए बाहर, तो मैंने उस लड़की से बात करने की सोची!
"रचना नाम है तुम्हारा?" मैंने पूछा,
"जी" वो घबरा के बोली,
"पढ़ाई-लिखाई नहीं की?" मैंने पूछा,
""आठ तक पढ़ी हूँ" वो बोली,
बेचारी....ऐसी बहुत हैं साध्वियां, साध्वियां ही कहूँगा, जो गरीबी के कारण ये मार्ग चुन लिया करती हैं, शोषण करना तो भारत देश में बहुत सरल है! लेकिन किसी को सहायता कर उसे सबल बनाना बहुत मुश्किल! ये भी अछूती नहीं थी!
"कभी पहले बैठी हो साधना में?" मैंने पूछा,
"हाँ" वो बोली,
उत्तर मेरी आशा के विपरीत थे उसका!
"कौन सी क्रिया?" मैंने पूछा,
अब उसने जो बताया, वो मात्र सशक्तिकरण था, और उसमे वो सफल भी नहीं हो पायी थी, बाबा उसको मात्र इसलिए लाये थे, की मैं अपना काम-मद दूर कर सकूँ, बहु-स्खलित हो सकूँ, ताकि देह में काम अपनमी अगन भड़का न सके! क्योंकि आगामी क्रिया एक महा-क्रिया थी! और ऐसा होना, सम्भव था! मुझे उस लड़की पर तरस आया!
"कितनी उम्र है तुम्हारी?" मैंने पूछा,
"बाइस" वो बोली,
केवल बाइस! और इस छोटी सी उम्र में, उसको यहां धकेल दिया गया था! ये गलत था बहुत, कम से कम मेरी समझ में तो!
"तुम अपने घर जाओ रचना, और हो सके तो इन कामों से दूर रहो, सम्भव हो तो पढ़ाई ज़ारी रखो कैसे भी, पुनः पढ़ाई करो, अभी कोई देर नहीं हुई है, अपने पांवों पर खड़ी हो जाओगी एक दिन, तब अफ़सोस नहीं होगा इस क्षेत्र में आने का! " मैंने कहा, और उठ गया,
"रुकिए" वो खड़े होते हुए बोली,
मैं रुक गया!
"कहो?" मैंने कहा,
"माँ को पैसे की ज़रूरत है" वो बोली,
"मैं बाबा से बात करूँगा" मैंने कहा,
और आ गया बाहर,
बाहर आया तो बाबा और वो महिला बतिया रहे थे!
"सही है?" बाबा ने पूछा,
"नहीं" मैंने कहा,
मैंने नहीं कहा, तो उस औरत को जैसे सांप सूंघा! अब उसके वो 'एडवांस' वापिस देना होगा जो शायद उसने खर्च कर दिया हो!
"ठीक है, ले जाओ उस लड़की को" बाबा बोले उस औरत से,
औरत सकपकाई सी अंदर गयी, थोड़ी देर अंदर ही रही, शायद पूछ-ताछ की हो उसने रचना से!
"चलो बाबा" मैंने कहा,
"अभी चलता हूँ" वे बोले,
इतने में वो लड़की और उसकी माँ आये वहाँ, नमस्ते की, और चलते बनीं!
"आओ" मैंने कहा,
"रुको" वे बोले,
और जब वो औरतें चली गयीं तो मुझसे सवाल किया उन्होंने!
"क्या हुआ?" पूछा उन्होंने!
"बहुत कच्ची है" मैंने कहा,
"कैसे?" बोले वो,
"कोई अनुभव नहीं है" मैंने कहा,
"अच्छा...ओह" वे बोले,
"उसकी माँ ने शायद अधिक ही बताया हो आपको" मैंने कहा,
"हाँ, यही बात है" वे बोले,
अब मैंने बाबा को उस लड़की की हर सम्भव मदद करने को कहा, मैं भी करूँगा, ये भी कहा, बाबा ने बाद में बात करने को कहा इस विषय पर!
"चलो, एक दूसरी से बात करता हूँ" वे बोले,
"ठीक है" मैंने कहा,
और अब मैं वापिस चला!
अपने कमरे में आया!
"क्या रहा?" पूछा शर्मा जी ने!
अब सारी बात बतायी मैंने उन्हें! उन्हें भी मेरा निर्णय सही ही लगा!
कोई दो घंटे के बाद, मुझे बाबा गिरि का समाचार मिला, मुझे बुलाया था उसी जगह, मैं समझ गया कि कोई और साध्वी आई है, मैं चल पड़ा!
वहां पहुंचा,
कमरे में झाँका, तो एक महिला थी, एक लड़की और बाबा वहाँ!
मैं अंदर जा बैठा! फिर से अकेले में बात करने को कहा, वो मान गए! चले गए बाहर!
अब मैं उस से मुख़ातिब हुआ,
"क्या नाम है तुम्हारा?" मैंने पूछा,
"भार्गवी" वो बोली,
नाम तो बहुत शानदार था उसका!
"उम्र क्या है?" मैंने पूछा,
"पच्चीस में चल रही हूँ" वो बोली,
उसके उत्तर देने के ढंग से समझ आया कि ये अनुभवी है!
"किसी क्रिया में बैठी हो?" मैंने पूछा,
"हाँ" वो बोली,
"कौन सी?" मैंने सवाल किया,
अब उसने उत्तर दिया और उत्तर सही ही दिया था! उसको अनुभव था!
"खड़ी हो जाओ" मैंने कहा,
वो खड़ी हो गयी,
अब मैंने उसके शरीर का परिमाप देखा, कंधे ऊपर नीचे तो नहीं? पाँव में कहीं कोई दोष तो नहीं? गरदन कहीं नीचे झुकी तो नहीं? सब ठीक था अभी तक, बाकी जांच बाद में होती, वो भी आवश्यक है! और करनी ही पड़ती है!
"मासिक आने में क्या देर है?" मैंने पूछा,
"बीस दिन" वो बोली,
तब तो ठीक था!
"आज रात नौ बजे, मेरे संग क्रिया में बैठना है, लेकिन उस से पहले जांच होगी, ठीक?" मैंने बताया उसको,
उसने गर्दन हिलाकर हाँ कहा,
"ठीक है, नौ बजे" मैंने कहा,
और मैं बाहर आ गया!
बाबा को बता दिया कि अभी तक तो ठीक है सबकुछ, आगे जांच में पता चले!
"कोई बात नहीं" वो औरत बोली,
और उस भार्गवी के बार में दो-चार तारीफ़ की चटकारें छोड़ दीं!

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Re: 2012- pilibheet ki ghatna.(वर्ष २०१२ पीलीभीत की एक घटना

Unread post by sexy » 19 Aug 2015 07:47

मैं वापिस आ गया था अपने कमरे में फिर! आते ही अपना बड़ा बैग संभाला, और कुछ ज़रूरत की वस्तुएं निकाल लीं बाहर, आज इनकी आवश्यकता थी! इनको भी अभिमंत्रित करना था! शर्मा जी ने पूछा तो मैंने बता दिया सबकुछ उस भार्गवी के बारे में, कुल मिलाकर भार्गवी अभी तक तो एक सही साध्वी दीख रही थी! वो तेज-तर्रार लग रही थी, लेकिन उसको आजमाया नहीं था, उसकी आँखों की पुतलियाँ जैसे हरक़त कर रही थीं मेरे प्रश्नों पर, वो मैं सब देख रहा था, आंकलन किये जा रहा था उसका, और तभी मैंने उसको आगे की जांच के लिए बुला लिया था आज रात नौ बजे, जांच के बाद ही ये निर्णय लेना था कि आगे करना क्या है, उस से पहले नहीं, समय की कोई कमी नहीं थी, लेकिन बारिश कभी भी खेल बिगाड़ सकती थी, बस उसी का डर था, नहीं तो समय की कोई कमी नहीं थी, कोई द्वन्द नहीं था कि समय निकले जा रहा हो आगे आगे! मैंने स्नान कर लिया था, उस शाम मदिरा नहीं ली थी, मदिरा का भोग उस साध्वी के संग ही करना था! ऐसी साध्वी को अक्सर पूर्णा कहा जाता है! इसी समय ये पूर्णा हुआ करती है और जैसे जैसे क्रिया आगे बढ़ती है, ये संज्ञा भी बदलने लगती यही, अंत तक, वो शक्ति के रूप में पूर्ण हो जाती है!
कोई पौने नौ बजे, मैंने अपना सामान संभाला, और चल पड़ा उस क्रिया-स्थल की ओर, अभी तक नहीं पहुंची थी वो साध्वी, अभी कुछ मिनट शेष थे, बत्ती की व्यवस्था कर दी गयी थी, और वैसे भी, जांच के पश्चात अलख का ही प्रकाश रहने वाला था वहाँ! मैंने सारा आवश्यक सामान निकाल लिया, अबी क्रिया आरम्भ करनी नहीं थी, जब तक कि वो न आ जाए, उसके बाद ही क्रिया आगे बढ़ पाती, पता नहीं, वो योग्य थी भी कि नहीं!
कोई नौ बजकर पांच मिनट पर, बाबा और वो महिला, उस साध्वी को लेकर आ गयीं, मैं अंदर ही था, ये बाबा को मालूम था, अतः वो अंदर नहीं आये, बाहर से ही उस महिला को ले, लौट गए, और वो साध्वी सीधा अंदर ही आ गयी! मैं खड़ा था, मुझे देखा तो प्रणाम किया उसने! अब मैंने उसको उसके बैठने का स्थान दिखाया, वो वहां जा बैठी! मैंने तब तांत्रिक-वंदना की, कि मेरे मन में कोई पाप न बसे, कोई ऐसी बात न हो जिस से मेरे गुरु की आन-शान में कोई खयानत हो! वंदना हो गयी! और अब मैं भी बैठ गया!
"इधर आओ" मैंने कहा,
वो खिसकी और आगे आ गयी मेरे पास, मेरे घुटने से उसका घुटना छू गया था, इतना समीप,
अब मैंने उसको अपना सम्पूर्ण परिचय दिया, अपने बारे में बताया, ताकि उसको पूर्ण विश्वास हो जाए मुझ पर, ये अत्यंत आवश्यक है!
"भार्गवी, चूंकि तुम पहले भी क्रिया में बैठी हो, अतः तुम्हे सारे नियम पता होंगे, इसीलिए, मन में कोई प्रश्न हो, शंका हो, तो पूछ लो" मैंने कहा,
उसने कोई प्रश्न नहीं किया, कोई शंका ज़ाहिर नहीं की,
"ठीक है भारगवी, अब वैसा ही करना जैसा मैं कहूँगा, कहूँगा मात्र एक बार, दुबारा नहीं, एक बार तुमने नहीं सुना, तो मैं तुम्हे वापिस भेज दूंगा, ठीक है?" मैंने पूछा,
"जी, ठीक है" वो बोली,
वो असहज नहीं हो रही थी, इसका लाभ मुझे मिलना ही चाहिए था, उसकी देह पुष्ट थी, और वो एक बढ़िया साध्वी सिद्ध होती, ये मेरा विश्वास था!
"वस्त्र उतारो अपने" मैंने कहा,
थोड़ा सा सकपकाई वो,
लेकिन यही तो कार्य था उसका, उसको इस समय ऐसा नहीं करना चाहिए था, उसके साथ कोई ज़बरदस्ती नहीं थी, ये उसकी इच्छा पर निर्धारित था, चाहे तो बैठे, नहीं तो जाए, कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं थी!
उसने धीरे धीरे अपना वस्त्र खोलने आरम्भ किये, और कुछ ही देर में, वो दो ही वस्त्रों में रह गयी,
"ये भी" मैंने कहा,
उसने वे भी उतार दिए,
"खड़ी हो जाओ" मैंने कहा,
वो खड़ी हो गयी,
अब मैंने उसकी देख का परिमापन आरम्भ किया, क्या कंधे बराबर हैं? कोई आगे या पीछे तो नहीं? कोई वक्र तो नहीं? छोटा-बड़ा तो नहीं? स्तन समरूप हैं या नहीं? के दोनों ही स्तनाग्र एक समान हैं अथवा नहीं? क्या नाभि भंवरिका रूप में है या नहीं? क्या नाभि में कोई मांस-पिंड तो नहीं दीखता? क्या योनि-स्थल में कोई दोष तो नहीं? क्या घुटने समरूप हैं? क्या पाँव एक जैसे हैं? उँगलियों में कोई दोष तो नहीं? क्या हाथों में, या उनकी उँगलियों में कोई दोष तो नहीं? आदि आदि जांच, ये सम्मुख जांच है, अब तक सब ठीक था!
"पीछे घूमो" मैंने कहा,
वो पीछे घूमी, कमर मेरी तरफ करके,
ये पश्चमुख जांच है!
क्या रीढ़ की हड्डी टेढ़ी तो नहीं? कोई कुब्ब तो नहीं? कहीं दीखती तो नहीं? कोई दोष तो नहीं? क्या नितम्ब सही विकसित हैं? क्या नितम्बों के ऊपर गड्ढे एकसार हैं या नहीं? कहीं एक ही तो नहीं? क्या जंघाओं में को दोष तो नहीं? पिंडलियाँ समान हैं? एड़ियां सही हैं, एक जैसी? कहीं एड़ियां अंदर को तो नहीं धसकती? ऐसा अक्सर होता है, आपने देखा होगा, कई पुरुषों और महिलाओं के जूते आदि अक्सर एक ही जगह से अधिक घिसते हैं, ये वही जाँच है! टखने समरूप हैं? अभी तक तो सब सही था! वो पूर्ण रूप से जांच में सफल होगी, अब मुझे विश्वास हो चला था!
"घूम जाओ" मैंने कहा,
वो घूम गयी,
एक तरफ से देखा,
ठीक था बदन उसका,
"दूसरी तरफ" मैंने कहा,
वो घूमी,
यहां भी ठीक था!
वो सफल हो गयी थी!
ये साध्वी बनने के लायक थी! बात बन गयी थी!
"पहन लो वस्त्र" मैंने कहा,
उसने अपने वस्त्र पहनने शुरू कर दिए!
जब पहन लिए तो खड़ी हो गयी वहीँ!
"आओ, बैठ जाओ" मैंने कहा,
वो बैठ गयी,
"मदिरा का सेवन कर लेती हो?" मैंने पूछा,
"हाँ" वो बोली,
अब उसका संकोच दूर हो गया था! आवाज़ में विश्वास भर गया था उसकी!
"ठीक है" मैंने कहा,
अब पहले से लाये सारे सामान को मैंने निकला बाहर, वहीँ रखा, और दो गिलास निकाल लिए! साथ में बोतल में भरा पानी भी!
"लो, तैयार करो" मैंने कहा,
उसे नहीं पता था कि मैं ऐसा कहूँगा उस से!
"मुझे नहीं आता" वो बोली,
मुस्कुराते हुए!
"सीख लो!" मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा,
अब उसने कोशिश की, मदिरा का ढक्क्न खोला मैंने, बोतल उसको दी, उसने पकड़ी, और गिलास में बस दो दो ढक्क्न के बराबर मदिरा दाल दी!
"ये क्या है?" मैंने पूछा,
"क्या?'' वो बोली,
"ये क्या डाला है?" मैं आहिस्ता से पूछा,
"मदिरा?" वो बोली,
"इतनी सी?" मैंने कहा,
"क्यों?" वो बोली,
"सुबह तक पीनी है क्या?" मैंने कहा!
अब वो समझी और हंस पड़ी!
मैंने बोतल ली उस से और गिलास में और मदिरा डाल दी!
"ये लो" मैंने गिलास उठाकर उसको दिया!
उसने गिलास लिया, और एक ही सांस में खींच गयी!
मेरे तो होश उड़ गए!
ये जोश था या होश??
"ये जोश था या होश?" मैंने पूछ ही लिया!
"होश!" वो बोली,
हँसते हुए!
मैं भी हंस पड़ा!
अब मैंने गिलास उठाया और खींच लिया!
उसने मुझसे भी यही प्रश्न कर लिया! मैंने उत्तर नहीं दिया! अब मुझसे खुलने लगी थी वो! एक टुकड़ा दिया गाजर का उसको,
"ये लो" उसने लिया और खा लिया,
"कहाँ की रहने वाली हो?" मैंने पूछा,
"रुद्रपुर" वो बोली,
"अच्छा" मैंने कहा,
"वो महिला माँ है तुम्हारी?" मैंने पूछा,
"नहीं" बोली वो,
"तो?" मैंने पूछा,
"जहाँ मैं रहती हूँ, वहाँ की उप-संचालिका है" वो बोली,
"अच्छा" मैंने कहा,
"माँ-बाप कहाँ हैं?" मैंने पूछा,
"बाप जीवित नहीं, माँ है, गाँव में" बोली वो,
"किसके साथ रहती हैं?" मैंने पूछा,
"छोटी दो बहनों के साथ" वो बोली,
"भाई नहीं है कोई?" मैंने पूछा,
"नहीं" वो बोली,
"अच्छा" मैंने कहा,
"यहाँ कौन लाया तुम्हें?" मैंने पूछा,
वो समझी नहीं, मैंने समझाया कि डेरे में कैसे पहुंची?
और जो बताया, वो नया नहीं था, कोई रिश्तेदार, कोई जानकार! यही देखा है मैंने तो आजतक!
"चलो दूसरा बनाओ" मैंने कहा,
उसने अब सही बनाया, और खींच लिया!
मैं फिर से देखता रह गया उसको! जोश चढ़ा था उसको!
और मैंने भी खींच लिया अपना गिलास!