रेल यात्रा compleet

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raj..
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Joined: 10 Oct 2014 01:37

Re: रेल यात्रा

Unread post by raj.. » 13 Oct 2014 16:03


ज्यों-ज्यों रात गहराती जा रही थी। यात्री खड़े खड़े ही ऊँघने से लगे थे।
आशीष ने देखा। कविता भी झटके खा रही है खड़ी खड़ी। आशीष ने भी किसी सज्जन
पुरुष की तरह उसकी गर्दन के साथ अपना हाथ सटा दिया। कविता ने एक बार आशीष
को देखा फिर आँखें बंद कर ली।
अब आशीष और खुल कर खतरा उठा सकता था। उसने अपने लंड को उसकी गांड की दरार
में से निकाल कर सीध में दबा दिया और रानी के बनाये रस्ते में से उंगली
घुसा दी। अंगुली अन्दर जाकर उसकी कच्छी से जा टकराई!
आशीष को अब रानी का डर नहीं था। उसने एक तरीका निकला। रानी की सलवार को
ठोडा ऊपर उठाया उसको कच्छी समेत पकड़ कर सलवार नीचे खीच दी। कच्छी थोड़ी
नीचे आ गयी और सलवार अपनी जगह पर। ऐसा करते हुए आशीष खुद के दिमाग की दाद
दे रहा था। हींग लगे न फिटकरी और रंग चौखा।
रानी ने कुछ देर ये तरीका समझा और फिर आगे का काम खुद संभल लिया। जल्द ही
उसकी कच्छी उसकी जांघो से नीचे आ गयी। अब तो बस हमला करने की देर थी।

आशीष ने उसकी गुदाज जांघो को सलवार के ऊपर से सहलाया। बड़ी मस्त और चिकनी
थी। उसने अपने लंड को रानी की साइड से बहार निकल कर उसके हाथ में पकड़ा
दिया। रानी उसको सहलाने लगी।
आशीष ने अपनी उंगली इतनी मेहनत से बनाये रास्तों से गुजार कर उसकी चूत के
मुंहाने तक पहुंचा दी। रानी सिसक पड़ी।
अब उसका हाथ आशीष के मोटे लंड पर जरा तेज़ी से चलने लगा। उत्तेजित होकर
उसने रानी को आगे से पीछे दबाया और अपनी ऊगली गीली हो चुकी चूत के अन्दर
घुसा दी। रानी चिल्लाते-चिल्लाते रुक गयी। आशीष निहाल हो गया। धीरे धीरे
करते-करते उसने जितनी खड़े-खड़े जा सकती थी उतनी उंगली घुसाकर अन्दर बहार
करनी शुरू कर दी। रानी के हाठों की जकड़न बढ़ते ही आशीष समझ गया की उसकी
अब बस छोड़ने ही वाली है। उसने लंड अपने हाथ में पकड़ लिया और जोर जोर से
हिलाने लगा। दोनों ही छलक उठे एक साथ। रानी ने अपना दबाव पीछे की और बड़ा
दिया ताकि भाभी पर उनके झटकों का असर कम से कम हो और अनजाने में ही वह एक
अनजान लड़के की उंगली से चुदवा बैठी। पर यात्रा अभी बहुत बाकी थी। उसने
पहली बार आशीष की तरफ देखा और मुस्कुरा दी!

अचानक आशीष को धक्का लगा और वो हडबडा कर परे हट गया। आशीष ने देखा उसकी
जगह करीब 45-46 साल के एक काले कलूटे आदमी ने ले ली। आशीष उसको उठाकर
फैंकने ही वाला था की उस आदमी ने धीरे से रानी के कान में बोला- "चुप कर
के खड़ी रहना साली। मैंने तुझे इस लम्बू से मजे लेते देखा है। ज्यादा
हीली तो सबको बता दूंगा। सारा डिब्बा तेरी गांड फाड़ डालेगा कमसिन जवानी
में!" वो डर गयी उसने आशीष की और देखा। आशीष पंगा नहीं लेना चाहता था। और
दूर हटकर खड़ा हो गया।
उस आदमी का जायजा अलग था। उस ने हिम्मत दिखाते हुए रानी की कमीज में हाथ
डाल दिया। आगे। रानी पूरा जोर लगा कर पीछे हट गयी। कहीं भाभी न जाग जाये।
उसकी गांड उस कालू के खड़े होते हुए लंड को और ज्यादा महसूस करने लगी।
रानी का बुरा हाल था। कालू उसकी चूचियां को बुरी तरह उमेठ रहा था। उसने
निप्पलों पर नाखून गड़ा दिए। रानी विरोध नहीं कर सकती थी।
एकाएक उस काले ने हाथ नीचे ले जाकर उसकी सलवार में डाल दिया। ज्यों ही
उसका हाथ रानी की चूत के मुहाने पर पहुंचा। रानी सिसक पड़ी। उसने अपना
मुंह फेरे खड़े आशीष को देखा। रानी को मजा तो बहुत आ रहा था पर आशीष जैसे
सुन्दर छोकरे के हाथ लगने के बाद उस कबाड़ की छेड़-छाड़ बुरी लग रही थी।

अचानक कालू ने रानी को पीछे खींच लिया। उसकी चूत पर दबाव बनाकर। कालू का
लंड उसकी सलवार के ऊपर से ही रानी की चूत पर टक्कर मारने लगा। रानी गरम
होती जा रही थी।
अब तो कालू ने हद कर दी। रानी की सलवार को ऊपर उठाकर उसके फटे हुए छेद को
तलाशा और उसमें अपना लंड घुसा कर रानी की चूत तक पहुंचा दिया। रानी ने
कालू को कसकर पकड़ लिया। अब उसको सब कुछ अच्छा लगने लगा था। आगे से अपने
हाथ से उसने रानी की कमसिन चूत की फाँकों को खोला और अच्छी तरह अपना लंड
सेट कर दिया। लगता था जैसे सभी लोग उन्ही को देख रहे हैं। रानी की आँखें
शर्म से झुक गयी पर वो कुछ न बोल पाई।
कहते हैं जबरदस्ती में रोमांस ज्यादा होता है। इसको रानी का सौभाग्य कहें
या कालू का दुर्भाग्य। गोला अन्दर फैकने से पहले ही फट गया। कालू का सारा
माल बहार ही निकल गया। रानी की सलवार और उसकी चिकनी मोटी जाँघों पर! कालू
जल्द ही भीड़ में गुम हो गया। रानी का बुरा हाल था। उसको अपनी चूत में
खालीपन सा लगा। लंड का। ऊपर से वो सारी चिपचिपी सी हो गयी। कालू के रस
में।

raj..
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Re: रेल यात्रा

Unread post by raj.. » 13 Oct 2014 16:03


गनीमत हुयी की जयपुर स्टेशन आ गया। वरना कई और भेड़िये इंतज़ार में खड़े थे।
अपनी अपनी बारी के।

जयपुर रेलवे स्टेशन पर वो सब ट्रेन से उतर गए। रानी का बुरा हाल था। वो
जानबुझ कर पीछे रह रही थी ताकि किसी को उसकी सलवार पर गिरे सफ़ेद धब्बे न
दिखाई दे जाये।

आशीष बोला- "ताऊ जी,कुछ खा पी लें! बहार चलकर। "

ताऊ पता नहीं किस किस्म का आदमी था- "बोला भाई जाकर तुम खा आओ! हम तो
अपना लेकर आये हैं।

कविता ने उसको दुत्कारा- "आप भी न बापू! जब हम खायेंगे तो ये नहीं खा
सकता। हमारे साथ। "
ताऊ- "बेटी मैंने तो इस लिए कह दिया था कहीं इसको हमारा खाना अच्छा न
लगे। शहर का लौंडा है न। हे राम! पैर दुखने लगे हैं। "

आशीष- "इसीलिए तो कहता हूँ ताऊ जी। किसी होटल में चलते हैं। खा भी लेंगे।
सुस्ता भी लेंगे।"

ताऊ- "बेटा, कहता तो तू ठीक ही है। पर उसके लिए पैसे।"

आशीष- "पैसों की चिंता मत करो ताऊ जी। मेरे पास हैं।" आशीष के ATM में
लाखों रुपैये थे।

ताऊ- "फिर तो चलो बेटा, होटल का ही खाते हैं।"
होटल में बैठते ही तीनो के होश उड़ गए। देखा रानी साथ नहीं थी। ताऊ और
कविता का चेहरा तो जैसा सफ़ेद हो गया।

आशीष ने उनको तसल्ली देते हुए कहा- "ताऊ जी, मैं देखकर आता हूँ। आप यहीं
बैठकर खाना खाईये तब तक।"

कविता- "मैं भी चलती हूँ साथ!"

ताऊ- "नहीं! कविता मैं अकेला यहाँ कैसे रहूँगा। तुम यहीं बैठी रहो। जा
बेटा जल्दी जा। और उसी रस्ते से देखते जाना, जिससे वो आए थे। मेरे तो
पैरों में जान नहीं है। नहीं तो मैं ही चला जाता।"

आशीष उसको ढूँढने निकल गया।

आशीष के मन में कई तरह की बातें आ रही थी।" कही पीछे से उसको किसी ने
अगवा न कर लिया हो! कही वो कालू। " वह स्टेशन के अन्दर घुसा ही था की
पीछे से आवाज आई- "भैया!"

आशीष को आवाज सुनी हुयी लगी तो पलटकर देखा। रानी स्टेशन के प्रवेश द्वार
पर सहमी हुयी सी खड़ी थी।

आशीष जैसे भाग कर गया- "पागल हो क्या? यहाँ क्या कर रही हो? चलो जल्दी। "

रानी को अब शांत सी थी।- "मैं क्या करती भैया। तुम्ही गायब हो गए अचानक!"

"ए सुन! ये मुझे भैया-भैया मत बोल "

"क्यूँ?"

"क्यूँ! क्यूंकि ट्रेन में मैंने "और ट्रेन का वाक्य याद आते ही आशीष के
दिमाग में एक प्लान कौंध गया!

"मेरा नाम आशीष है समझी! और मुझे तू नाम से ही बुलाएगी। चल जल्दी चल!"

आशीष कहकर आगे बढ़ गया और रानी उसके पीछे पीछे चलती रही।
आशीष उसको शहर की और न ले जाकर स्टेशन से बहार निकलते ही रेल की पटरी के
साथ साथ एक सड़क पर चलने लगा। आगे अँधेरा था। वहां काम बन सकता था!

"यहाँ कहाँ ले जा रहे हो, आशीष!" रानी अँधेरा सा देखकर चिंतित सी हो गयी।

"तू चुप चाप मेरे पीछे आ जा। नहीं तो कोई उस कालू जैसा तुम्हारी। समाझ
गयी न।" आशीष ने उसको ट्रेन की बातें याद दिला कर गरम करने की कोशिश की।

"तुमने मुझे बचाया क्यूँ नहीं। इतने तगड़े होकर भी डर गए ", रानी ने
शिकायती लहजे में कहा।

"अच्छा! याद नहीं वो साला क्या बोल रहा था। सबको बता देता। "

रानी चुप हो गयी। आशीष बोला- "और तुम खो कैसे गयी थी। साथ साथ नहीं चल सकती थी? "

रानी को अपनी सलवार याद आ गयी- "वो मैं!" कहते कहते वो चुप हो गयी।

"क्या?" आशीष ने बात पूरी करने को कहा।

"उसने मेरी सलवार गन्दी कर दी। मैं झुक कर उसको साफ़ करने लगी। उठकर देखा तो। "
आशीष ने उसकी सलवार को देखने की कोशिश की पर अँधेरा इतना गहरा था की सफ़ेद
सी सलवार भी उसको दिखाई न दी।

raj..
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Re: रेल यात्रा

Unread post by raj.. » 13 Oct 2014 16:04



आशीष ने देखा। पटरी के साथ में एक खाली डिब्बा खड़ा है। साइड वाले
अतिरिक्त पटरी पर। आशीष काँटों से होता हुआ उस रेलगाड़ी के डिब्बे की और
जाने लगा।

"ये तुम जा कहाँ रहे हो?, आशीष!"

" आना है तो आ जाओ। वरना भाड़ में जाओ। ज्यादा सवाल मत करो!"

वो चुपचाप चलती गयी। उसके पास कोई विकल्प ही नहीं था।

आशीष इधर उधर देखकर डिब्बे में चढ़ गया। रानी न चढ़ी। वो खतरे को भांप
चुकी थी- "प्लीज मुझे मेरे बापू के पास ले चलो। "
वो डरकर रोने लगी। उसकी सुबकियाँ अँधेरे में साफ़ साफ़ सुनाई दे रही थी।

"देखो रानी! डरो मत। मैं वही करूँगा बस जो मैंने ट्रेन में किया था। फिर
तुम्हे बापू के पास ले जाऊँगा! अगर तुम नहीं करोगी तो मैं यहीं से भाग
जाऊँगा। फिर कोई तुम्हे उठाकर ले जाएगा और चोद चाद कर रंडी मार्केट में
बेच देगा। फिर चुदवाती रहना सारी उम्र। " आशीष ने उसको डराने की कोशिश की
और उसकी तरकीब काम कर गयी।।

रानी को सारी उम्र चुदवाने से एक बार की छेड़छाड़ करवाने में ज्यादा फायदा
नजर आया। वो डिब्बे में चढ़ गयी।
डिब्बे में चढ़ते ही आशीष ने उसको लपक लिया। वह पागलों की तरह उसके मैले
कपड़ों के ऊपर से ही उसको चूमने लगा।

रानी को अच्छा नहीं लग रहा था। वो तो बस अपने बापू के पास जाना चाहती
थी।- "अब जल्दी कर लो न। ये क्या कर रहे हो?"

आशीष भी देरी के मूड में नहीं था। उसने रानी के कमीज को उठाया और उसी छेद
से अपनी ऊँगली रानी के पिछवाड़े से उसकी चूत में डालने की कोशिश करने
लगा। जल्द ही उसको अपनी बेवकूफी का अहसास हुआ। वासना में अँधा वह ये तो
भूल ही गया था की अब तो वो दोनों अकेले हैं।
उसने रानी की सलवार का नाडा खोलने की कोशिश की।
रानी सहम सी गयी। "छेद में से ही डाल लो न।!"

"ज्यादा मत बोल। अब तुने अगर किसी भी बात को "न " कहा तो मैं तभी भाग
जाऊँगा यहीं छोड़ कर। समझी!" आशीष की धमकी काम कर गयी। अब वो बिलकुल चुप
हो गयी
आशीष ने सलवार के साथ ही उसके कालू के रस में भीगी कच्छी को उतार कर फैंक
दिया। कच्छी नीचे गिर गयी। डिब्बे से!
रानी बिलकुल नंगी हो चुकी थी। नीचे से!
आशीष ने उसको हाथ ऊपर करने को कहा और उसका कमीज और ब्रा भी उतार दी। रानी रोने लगी।

"चुप करती है या जाऊ मैं!"