संघर्ष

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rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 14 Dec 2014 10:38

संघर्ष--13 अब सावित्री का कलेजा तेज़ी से धक धक कर रहा था. वह काफ़ी हिम्मत करके पंडित जी के तरफ बढ़ी लेकिन चटाई से कुछ दूर पर ही खड़ी हो गयी और अपनी आँखें लगभग बंद कर ली. वह पंडित जी को देख पाने की हिम्मत नही जुटा जा पा रही थी. तभी पंडित जी चटाई पर से खड़े हुए और सावित्री का एक हाथ पकड़ कर चटाई पर खींच कर ले गये. फिर चटाई के बीच मे बैठ कर सावित्री का हाथ पकड़ कर अपनी गोद मे खींच कर बैठाने लगे. पंडित जी के मजबूत हाथों के खिचाव से सावित्री उनके गोद मे अपने बड़े बड़े चूतादो के साथ बैठ गयी. अगले पल मानो एक बिजली सी उसके शरीर मे दौड़ उठी. सावित्री अपने पूरे कपड़े मे थी. गोद मे बैठते ही पंडित जी ने सावित्री के दुपट्टे को उसके गले और चूचियो पर से हटा कर फर्श पर फेंक दिए. अब सावित्री की बड़ी बड़ी चुचियाँ केवल समीज़ मे एक दम बाहर की ओर निकली हुई दीख रहीं थी. सावित्री अपनी आँखें लगभग बंद कर रखी थी. लेकिन सावित्री ने अपने हाथों से अपने चुचिओ को ढकने की कोई कोशिस नही की और दोनो चुचियाँ समीज़ मे एक दम से खड़ी खड़ी थी. मानो सावित्री खुद ही दोनो गोल गोल कसे हुए चुचिओ को दिखाना चाहती हो. पिछले दिन के चुदाई के मज़ा ने सावित्री को लालची बना दिया था. सावित्री पंडित जी के गोद मे बैठे ही बैठे मस्त होती जा रही थी. पंडित जी ने सावित्री के दोनो चुचिओ को गौर से देखते हुए उनपर हल्के से हाथ फेरा मानो चुचिओ की साइज़ और कसाव नाप रहे हों. सावित्री को पंडित जी का हाथ फेरना और हल्का सा चुचिओ का नाप तौल करना बहुत ही अच्छा लग रहा था. इसी वजह से वह अपनी चुचिओ को छुपाने के बजाय कुछ उचका कर और बाहर की ओर निकाल दी जिससे पंडित जी उसकी चुचिओ को अपने हाथों मे पूरी तरह से पकड़ ले. सावित्री पंडित जी की गोद मे एकदम मूर्ति की तरह बैठ कर मज़ा ले रही थी. फिर उसे याद आया कि कल की तरह आज भी समीज़ नही निकाल पाई थी. फिर अगले पल वह खुद ही पंडित जी के गोद मे आगे की ओर थोड़ी सी उचकी और अपने समीज़ को दोनो हाथों से खुद ही निकालने लगी. आज वह खुद ही आगे आगे चल रही थी. सावित्री को अब देर करना ठीक नही लग रहा था. आख़िर समीज़ को निकाल कर फर्श पर रख दी. फिर पंडित जी की गोद मे खुद ही काफ़ी ठीक से बैठ कर अपने सिर को कुछ झुका ली. लेकिन दोनो छातियो को ब्रा मे और उपर करके निकाल दी. पंडित जी सावित्री के उतावलेपन को देख कर मस्त हो गये. वह सोचने लगे कि कल ही सील तुड़ाई और आज लंड के लिए पग्लाने लगी है. फिर भी पंडित जी एक पुराने चोदु थे और अपने जीवन मे बहुत सी लड़कियो और औरतों को चोद चुके थे इस वजह से वे कई किस्म की लड़कियो और औरतों के स्वाभाव से भली भाँति परिचित थे. इस वजह से समझ गये की सावित्री काफ़ी गर्म किस्म की लड़की है और अपने जीवन मे एक बड़ी छिनाल भी बन सकती है, बस ज़रूरत है उसको छिनाल बनाने वालों की. अगले पल मे यही सोचने लगे की सावित्री को उसके गाओं वाले खुद ही एक बड़ी चुड़ैल बना देंगे बस उन्हे मौका मिल जाए. क्योंकि सावित्री के गाँव मे भी एक से एक चोदु आवारा रहते थे. पंडित जी यही सब सोच रहे थे और ब्रा के उपर से दोनो चुचिओ को अपने हाथों से हल्के हल्के दबा रहे था. सावित्री अपने शरीर को काफ़ी अकड़ कर पंडित जी के गोद मे बैठी थी जैसे लग रहा था कि वह खुद ही दब्वाना चाहती हो. पंडित जी नेब्रा के उपर से ही दोनो चुचिओ को मसलना सुरू कर दिया और थोड़ी देर बाद ब्रा की हुक को पीछे से खोल कर दोनो चुचिओ से जैसे ही हटाया की दोनो चुचियाँ एक झटके के साथ बाहर आ गयीं. चुचियाँ जैसे ही बाहर आईं की सावित्री की मस्ती और बढ़ गयी और वह सोचने लगी की जल्दी से पंडित जी दोनो चुचिओ को कस कस कर मीसे. और पंडित जी ब्रा को फर्श पर पड़े दुपट्टे और समीज़ के उपर ही ब्रा को फेंक कर चुचिओ पर हाथ फिराना सुरू कर दिया. नंगी चुचिओ पर पंडित जी हाथ फिरा कर चुचिओ के आकार और कसाव को देख रहे थे जबकि सावित्री के इच्छा थी की पंडित जी उसकी चुचिओ को अब ज़ोर ज़ोर से मीसे. आख़िर सावित्री लाज़ के मारे कुछ कह नही सकती तो अपनी इस इच्छा को पंडित जी के सामने रखने के लिए अपने छाति को बाहर की ओर उचकाते हुए एक मदहोशी भरे अंदाज़ मे पंडित जी के गोद मे कसमासाई तो पंडित जी समझ गये और बोले "थोड़ा धीरज रख रे छिनाल,, अभी तुझे कस कस के चोदुन्गा,,, धीरे धीरे मज़ा ले अपनी जवानी का समझी, तू तो इस उम्र मे लंड के लिए इतना पगला गयी है आगे क्या करेगी कुतिया साली,,,,,"" पंडित जी भी सावित्री की गर्मी देख कर दंग रह गये. उन्हे भी ऐसी किसी औरत से कभी पाला ही नही पड़ा था जो सील टूटने के दूसरे दिन ही रंडी की तरह व्यवहार करने लगे. सावित्री के कान मे पंडित जी की आवाज़ जाते ही डर के बजाय एक नई मस्ती फिर दौड़ गयी. तब पंडित जी ने उसके दोनो चुचिओ को कस कस कर मीज़ना सुरू कर दिया. ऐसा देख कर सावित्री अपनी छातियो को पंडित जी के हाथ मे उचकाने लगी. रह रह कर पंडित जी सावित्री के चुचिओ की घुंडीओ को भी ऐंठने लगे फिर दोनो चुचिओ को मुँह मे लेकर खूब चुसाइ सुरू कर दी. अब क्या था सावित्री की आँखें ढपने लगी और उसकी जांघों के बीच अब सनसनाहट फैलने लगी थोड़ी देर की चुसाइ के बाद बुर मे चुनचुनी उठने लगी मानो चींटियाँ रेंग रहीं हो. अब सावित्री कुछ और मस्त हो गयी और लाज़ और शर्म मानो शरीर से गायब होता जा रहा था. पंडित जी जो की काफ़ी गोरे रंग के थे और धोती और लंगोट मे चटाई के बीच मे बैठे और उनकी गोद मे सावित्री काफ़ी साँवली रंग की थी और चुहियाँ भी साँवली थी और उसकी घुंडिया तो एकदम से काले अंगूर की तरह थी जो पंडित जी के गोरे मुँह मे काले अंगूर की तरह कड़े और खड़े थे जिसे वी चूस रहे थे. पंडित जी की गोद मे बैठी सावित्री पंडित जी के काफ़ी गोरे होने के वजह से मानो सावित्री एकदम काली नज़र आ रही थी. दोनो के रंग एक दूसरे के बिपरीत ही थे. जहाँ पंडित जी लंड भी गोरा था वहीं सावित्री की बुर तो एकदम से काली थी. सावित्री की चुचिओ की चुसाइ के बीच मे ही पंडित जी ने सावित्री के मुँह को अपने हाथ से ज़ोर से पकड़ कर अपने मुँह मे सताया. फिर सावित्री के निचले और उपरी होंठो को चूसने और चाटने लगी. सावित्री एकदम से पागल सी हो गयी. अब उसे लगा की बुर मे फिर पिछले दिन की तरह कुछ गीला पन हो रहा है. सावित्री पंडित जी के गोद मे बैठे ही बैठे अपने होंठो को चूसा रही थी तभी पंडित जी बोले "जीभ निकाल" सावित्री को समझ नही आया की जीभ का क्या करेंगे. फिर भी मस्त होने की स्थिति मे उसने अपने जीभ को अपने मुँह से बाहर निकाली और पंडित जी लपाक से अपने दोनो होंठो मे कस कर चूसने लगे. जीभ पर लगे सावित्री के मुँह मे का थूक चाट गये. सावित्री को जीभ का चटाना बहुत अच्छा लगा. फिर पंडित जी अपने मुँह के होंठो को सावित्री के मुँह के होंठो पर कुछ ऐसा कर के जमा दिए की दोनो लोंगो के मुँह एक दूसरे से एकदम सॅट गया और अगले ही पल पंडित जी ने ढेर सारा थूक अपने मुँह मे से सावित्री के मुँह मे धकेलना सुरू कर किया. सावित्री अपने मुँह मे पंडित जी का थूक के आने से कुछ घबरा सी गयी और अपने मुँह हटाना चाही लेकिन सावित्री के मुँह के जबड़े को पंडित जी ने अपने हाथों से कस कर पकड़ लिए था. तभी पंडित जी के मुँह मे से ढेर सारा थूक सावित्री के मुँह मे आया ही था की सावित्री को लगा की उसे उल्टी हो जाएगी और लगभग तड़फ़ड़ाते हुए अपने मुँह को पंडित जी के मुँह से हटाने की जोरे मारी. तब पंडित जी ने उसके जबड़े पर से अपना हाथ हटा लिए और सावित्री के मुँह मे जो भी पंडित जी का थूक था वह उसे निगल गयी. लेकिन फिर पंडित जी ने सावित्री के जबड़े को पकड़ के ज़ोर से दबा कर मुँह को चौड़ा किए और मुँह के चौड़ा होते ही अपने मुँह मे बचे हुए थूक को सावित्री के मुँह के अंदर बीचोबीच थूक दिया जो की सीधे सावित्री के गले के कंठ मे गिरी और सावित्री उसे भी निगल गयी.

क्रमशः...............

Sangharsh--13

ab savitri ka kaleja teji se dhak dhak kar rahaa tha. vah kafi himmat karke pandit ji ke taraf badhi lekin chatai se kuch dur par hi khadi ho gayi aur apni ankhen lagbhag band kar lee. vah pandit ji ko dekh paane ki himmat nahi juta ja pa rahi thi. tabhi pandit ji chatai par se khade huye aur savitri ka ek hath pakad kar chatai par kheench kar le gaye. fir chatai ke beech me baith kar savitri ka hath pakad kar apni god me kheench kar baithane lage. pandit ji ke majboot hathon ke khichav se savitri unke god me apne bade bade chutado ke sath baith gayi. agle pal mano ek bijli si uske shareer me daud uthi. savitri apne pure kapade me thi. god me baithre hi pandit ji ne savitri ke dupatte ko uske gale aur chation par se hata kar farsh par fenk diye. ab savitri ki badi badi chuchian keval sameej me ek dam bahar ki or nikali hui deekh rahin thin. savitri apni ankhen lagbhag band kar rakhi thi. lekin savitri ne apne hathon se apne chuchion ko dhakne ki koi koshis nahi ki aur dono chuchian sameej me ek dam se khadi khadi thin. mano savitri khud hi dono gol gol kase huye chuchion ko dikhana chahti ho. pichle din ke chudai ke mazaa ne savitiri ko lalachi bana diya tha. savitri pandit ji ke god me baithe hi baithe mast hoti ja rahi thi. pandit ji ne savitri ke dono chuchion ko gaur se dekhte huye unpar halke se hath fera mano chuchion ki size aur kasaav naap rahe hon. savitri ko pandit ji ka haath ferna aur halka sa chuchion ka naap taul karna bahut hi achha lag rahaa tha. isi vajah se vah apni chuchion ko chupaane ke bajay kuch uchka kar aur baahar ki or nikaal di jisase pandit ji uski chuchion ko apne haathon me puri tarah se pakad le. savitri pandit ji ki god me ekdam murti ki tarah baith kar mazaa le rahi thi. fir use yaad aaya ki kal ki tarah aaj bhi sameez nahi nikaal paayi thi. fir agle pal vah khud hi pandit ji ke god me aage ke or thodi si uchaki aur apne sameez ko dono hathon se khud hi nikalne lagi. aaj vah khud hi aage aage chal rahi thi. savitri ko ab der karna theek nahi lag rahaa tha. akhir sameez ko nikaal kar farsh par rakh di. fir pandit ji ki god me khud hi kafi theek se baith kar apne sir ko kuch jhuka li. lekin dono chation ko bra me aur utaan karke nikaal di. pandit ji savitri ke utavlepan ko dekh kar mast ho gaye. vah sochne lage ki kal hi seal tudaai aur aaj lund ke liye paglaane lagi hai. fir bhi pandit ji ek puraane chodu the aur apne jeevan me bahut si ladkion aur aurton ko chod chuke the is vajah se ve kai kism ki ladkion aur aurton ke swabhav se bhali bhanti parichit the. is vajah se samajh gaye ki savitri kafi garm kism ki ladki hai aur apne jeevan me ek badi chhinaar bhi ban sakti hai, bas jaroorat hai usko chhinaar banaane walon ki. agle pal me yahi sochne lage ki savitri ko uske gaon waale khud hi ek badi chudail banaa denge bas unhe mauka mil jaaye. kyonki savitri ke goan me bhi ek se ek chodu awara rahte the. pandit ji yahi sab soch rahe the aur bra ke upar se dono chuchion ko apne hathon se halke halke dabaa rahe tha. savitri apne shareer ko kafi akad kar pandit ji ke god me baithi thi jaise lag rahaa tha ki vah khud hi dabvaana chahti ho. pandit ji bra ke upar se hi dono chuchion ko maslana suru kar diya aur thodi der baad bra ki huk ko piche se khol kar dono chuchion se jaise hi hataya ki dono chuchian ek jhatke ke sath bahar aa gayin. chuchian jaise hi baahar aayin ki savitri ki masti aur badh gayi aur vah sochne lagi ki jaldi se pandit ji dono chuchion ko kas kas kar mise. aur pandit ji bra ko farsh par pade dupatte aur sameez ke upar hi bra ko fenk kar chuchion par hath firana suru kar diya. nangi chuchion par pandit ji hath fira kar chuchion ke akaar aur kasaav ko dekh rahe the jabki savitri ke ichha thi ki pandit ji uski chuchion ko ab jor jor se misen. akhir savitri laaz ke maare kuch kah nahi sakti to apni is ichha ko pandit ji ke samne rakhne ke liye apne chhaati ko baahar ki or uchkate huye ek madhoshi bhare andaaz me pandit ji ke god me kasmasaai to pandit ji samajh gaye aur bole "thoda dheeraj rakh re chhinaar,, abhi tujhe kas kas ke chodunga,,, dheere dheere mazaa le apni jawaani ka samajhi, tu to is umra me lund ke liye itnaa pagalaa gayi hai aage kya karegi kutia saali,,,,,"" pandit ji bhi savitri ki garmi dekh kar dang rah gaye. unhe bhi aisi kisi aurat se kabhi pala hi nahi pada tha jo seal tootne ke dusre din hi randi ki tarah vyawhaar karne lage. savitri ke kaan me pandit ji ki awaaz jaate hi dar ke bajaay ek nahi masti fir daud gayi. tab pandit ji ne uske dono chuchion ko kas kas kar meezna suru kar diya. aisa dekh kar savitri apne chation ko pandit ji ke hath me uchakaane lagi. rah rah kar pandit ji savitri ke chuchion ke ghundion ko bhi ainthne lage fir dono chuchion ko munh me lekar khoob chusaai suru kar di. ab kya tha savitri ki ankhen dhapne lagi aur uski janghon ke beech ab sansanaahat failne lagi thodi der ki chusaai ke bad bur me chunchuni uthne lagi mano cheentian reng rahin ho. ab savitri kuch aur mast ho gayi aur laaz aur sharm mano shareer se gayab hota jaa rahaa tha. pandit ji jo ki kafi gore rang ke the aur dhoti aur langot me chatai ke beech me baithe aur unki god me savitri kafi sanvali rang ki thi aur chuhian bhi sanvli thin aur uski ghundian to ekdam se kaale angur ki tarah thi jo pandit ji ke gore munh me kaale angur ki tarah kade aur khade the jise we chus rahe the. pandit ji ki god me baithi savitri pandit ji ke kafi gore hone ke vajah se mano savitri ekdam kali nazar aa rahi thi. dono ke rang ek dusre ke biprit hi the. jahan pandit ji lund bhi gora tha vahin savitri ki bur to ekdam se kaali thi. savitri ki chuchion ki chusaai ke beech me hi pandit ji ne savitri ke munh ko apne hath se jor se pakad kar apne munh me sataya. fir savitri ke nichle aur upari othon ko chusne aur chatne lagi. savitri ekdam se paagal si ho gayi. ab use laga ki bur me fir pichle din ki tarah kuch geela pan ho raha hai. savitri pandit ji ke god me baithe hi baithe apne othon ko chusa rahi thi tabhi pandit ji bole "jeebh nikaal" savitri ko samajh nahi aaya ki jeebh ka kya karenge. fir bhi mast hone ki sthiti me usne apne jeebh ko apne munh se baahar nikali aur pandit ji lapaak se apne dono onthon me kas kar chusne lage. jeebh par lage savitri ke munh me ka thuk chat gaye. savitri ko jeebh ka chataana bahut achha laga. fir pandit ji apne munh ke onthon ko savitri ke munh ke othon par kuch aisa kar ke jamaa diye ki dono longo ke munh ek dusre se ekdam sat gaya aur agle hi pal pandit ji ne dher sara thuk apne munh me se savitri ke munh me dhakelna suru kar kiya. savitri apne munh me pandit ji ka thuk ke aane se kuch ghabra si gayi aur apne munh hatana chahi lekin savitri ke munh ke jabade ko pandit ji ne apne hathon se kas kar pakad liye tha. tabhi pandit ji ke munh me se dher sara thuk savitri ke munh me aaya hi tha ki savitri ko laga ki use ulti ho jayegei aur lagbhag tadfadaate huye apne munh ko pandit ji ke munh se hataane ki jore maari. tab pandit ji ne uske jabade par se apna hath hata liye aur savitri ke munh me jo bhi pandit ji ka thuk tha vah use nigal gayi. lekin fir pandit ji ne savitri ke jabade ko pakad ke jore se dabaa kar munh ko chauda kiye aur munh ke chauda hote hi apne munh me bache huye thuk ko savitri ke munh ke ander beechobeech thook diya jo ki sidhe savitri ke gale ke kanth me giri aur savitri use bhi nigal gayi.


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 15 Dec 2014 03:57

संघर्ष--14 सावित्री के मुँह मे पंडित जी का थूक जाते ही उसके शरीर मे अश्लीलता और वासना का एक नया तेज नशा होना सुरू हो गया. मानो पंडित जी ने सावित्री के मुँह मे थूक नही बल्कि कोई नशीला चीज़ डाल दिया हो. सावित्री मदहोशी की हालत मे अपने सलवार के उपर से ही बुर को भींच लिया. पंडित जी सावित्री की यह हरकत देखते समझ गये कि अब बुर की फाँकें फड़फड़ा रही हैं. दूसरे पल पंडित जी के हाथ सावित्री के सलवार के जरवाँ पर पहुँच कर जरवाँ की गाँठ खोलने लगा. लेकिन पंडित जी की गोद मे बैठी सावित्री के सलवार की गाँठ कुछ कसा बँधे होने से खुल नही पा रहा था.. ऐसा देखते ही सावित्री पंडित जी की गोद मे बैठे ही बैठे अपने दोनो हाथ जरवाँ पर लेजाकर पंडित जी के हाथ की उंगलिओ को हटा कर खुद ही जरवाँ की गाँठ खोलने लगीं. ऐसा देख कर पंडित जी ने अपने हाथ को जरवाँ की गाँठ के थोड़ा दूर कर के सावित्री के द्वारा जरवाँ को खुल जाने का इंतजार करने लगे. अगले पल जारवा की गाँठ सावित्री के दोनो हाथों नेकी उंगलियाँ खोल दी और फिर सावित्री के दोनो हाथ अलग अलग हो गये. यह देख कर पंडित जी समझ गये की आगे का काम उनका है क्योंकि सावित्री सलवार के जरवाँ के गाँठ खुलते ही हाथ हटा लेने का मतलब था कि वह खुद सलवार नही निकलना चाहती थी. शायद लाज़ के कारण. फिर सावित्री का हाथ हटते ही पंडित जी अपने हाथ को सलवार के जरवाँ को उसके कमर मे से ढीला करने लगे. पंडित जी के गोद मे बैठी सावित्री के कमर मे सलवार के ढीले होते ही सलवार कमर के कुछ नीचे हुआ तो गोद मे बैठी सावित्री की चड्डी का उपरी हिस्सा दिखने लगा. फिर पंडित जी अगले पल ज्योन्हि सावित्री की सलवार को निकालने की कोशिस करना सुरू किए की सावित्री ने अपने चौड़े चूतदों को गोद मे से कुछ उपर की ओर हवा मे उठा दी और मौका देखते ही पंडित जी सलवार को सावित्री के चूतदों के नीचे से सरकाकर उसके पैरों से होते हुए निकाल कर फर्श पर फेंक दिए. अब फिर केवल चड्डी मे सावित्री अपने बड़े बड़े और काले चूतदों को पंडित जी के गोद मे बैठ गयी. सावित्री के दोनो चूतड़ चौड़े होने के नाते काफ़ी बड़े बड़े लग रहे थे और फैले से गये थे. जिस अंदाज़ मे सावित्री बैठी थी उससे उसकी लंड की भूख एकदम सॉफ दिख रही थी. चेहरे पर जो भाव थे वह उसके बेशर्मी को बता रहे थे. शायद पिछले दिन जो चुदाई का मज़ा मिला था वही मज़ा फिर लेना चाह रही थी. अब सावित्री की साँसे और तेज चल रही थी. . सलवार हटते ही सावित्री के जंघें भी नंगी हो गयी जिसपर पंडित जी की नज़र और हाथ फिसलने लगे. सावित्री की जंघें काफ़ी मांसल और गोल गोल साँवले रंग की थी. लेकिन बुर के पास के जाँघ का हिस्सा कुछ ज़्यादा ही सांवला था. पंडित जी सावित्री के नंगी और मांसल साँवले रंग की जांघों को आज काफ़ी ध्यान से देख रहे थे. अट्ठारह साल की सावित्री जो की पंडित जी के गोद मे ऐसे बैठी थी मानो अब पंडित जी के गोद से उठना नही चाहती हो. पंडित जी का लंड भी धोती के अंदर ढीले लंगोट मे खड़ा हो चुका था. जिसका कडापन और चुभन केवल चड्डी मे बैठी सावित्री अपने काले चूतदों मे आराम से महसूस कर रही थी. फिर भी बहुत ही आराम से एक चुदैल औरत की तरह अपने दोनो चूतदों को उनके गोद मे पसार कर बैठी थी. पंडित जी सावित्री को गोद मे बैठाए हुए उसकी नंगी गोल गोल चुचिओ पर हाथ फेरते हुए काफ़ी धीरे से पुचछा "मज़ा पा रही हो ना" इस पर सावित्री ने धीरे से बोली "जी". और अगले पल अपनी सिर कुछ नीचे झुका ली. साँसे कुछ तेज ले रही थी. लेकिन पंडित जी ने धीरे से फिर पुचछा "तुम्हे कभी कोई चोदने की कोशिस नही की थी क्या,,, तेरे गाओं मे तो बहुत सारे आवारा हैं." इस सवाल पर सावित्री ने कुछ जबाब नही दिया बल्कि अपनी नज़रे झुकाए ही रही. "गाँव मे इधेर उधेर घूमने फिरने नही जाती थी क्या" पंडित जी ने दुबारा धीरे से पुछा तो सावित्री ने नही मे सिर हिलाया तो पंडित जी बोले "घर पर ही पड़ी रहती थी इसी वजह से बची रही नही तो घर से बाहर कदम रखी होती तो आज के माहौल तुरंत चुद जाती., वैसे तेरे गाओं मे आवारे भी बहुत ज़्यादे हैं..... तेरी मा बेचारी भी कुछ नही कर पति उन बदमाशों का और वो सब तेरे को चोद चोद कर गाओं की कुतिया बना देते." पंडित जी अपने गोद मे बैठी हुई सावित्री के जांघों पर हाथ फेरते हुए फिर बोले "बेचारी तेरी मा अपनी हिफ़ाज़त कर ले वही बहुत है नही तो विधवा बेचारी का कहीं भी पैर फिसला तो गाओं के लोफरों और अवारों के लंड के नीचे दब्ते देर नही लगेगी." आगे फिर बोले "और अवारों के लंड का पानी बहुत ज़्यादे ही नशीला होता है" आगे फिर बोले "और जिस औरत को आवारा चोद कर उसकी बुर मे अपने लंड का नशीला पानी गिरा देते हैं वह औरत अपने जीवन मे सुधर नही सकती,...और एक पक्की चुदैल बन ही जाती हैं, समझी....... तुम भी बच के रहना इन आवारों से, .....इनके लंड का पानी बहुत तेज होता है" पंडित जी सावित्री के चड्डी के उपर से ही बुर को मीज़ते हुए यह सब बातें धीरे धीरे बोल रहे थे और सावित्री सब चुप चाप सुन रही थी. वह गहरी गहरी साँसें ले रही थी और नज़रें झुकाए हुए थी. पंडित जी की बातें सुन रही सावित्री खूब अच्छी तरह समझ रही थी कि पंडित जी किन आवारों की बात कर रहें हैं. लेकिन वह नही समझ पा रही थी कि अवारों के लंड का पानी मे कौन सा नशा होता है जो औरत को छिनार या चुदैल बना देता है. वैसे सावित्री तो बस पिछले दिन ही किसी मर्द के लंड का पानी अपनी बुर मे गिरता महसूस की थी जो कि पंडित जी के लंड का था. पंडित जी यह सब बता कर उसे अवारों से दूर रहने की हिदायत और सलाह दे रहे थे. शवित्री को पंडित जी की यह सब बातें केवल एक सलाह लग रही थी जबकि वास्तव मे पंडित जी के मन मे यह डर था कि अब सावित्री को लंड का स्वाद मिल चुका है और वह काफ़ी गर्म भी है. ऐसे मे यदि को गाओं के आवारा मौका पा के सावित्री का रगड़दार चुदाई कर देंगे तो सावित्री केवल पंडित जी से चुद्ते रहना उतना पसंद नही करेगी और अपने गाओं के आवारे लुंडों के चक्कर मे इधेर उधेर घूमती फिरती रहेगी. जिससे हो सकता है कि पंडित जी के दुकान पर आना जाना भी बंद कर दे. इसी वजह से पंडित जी भी आवारों से बचने की सलाह दे रहे थे. बुर को चड्डी के उपर से सहलाते हुए जब भी बुर के छेद वाले हिस्से पर उंगली जाती तो चड्डी को छेद वाला हिस्सा बुर के रस से भीगे होने से पंडित जी की उंगली भी भीग जा रही थी. पंडित जी जब यह देखे कि सावित्री की बुर अब बह रही है तो उसकी चड्डी निकालने के लिए अपने हाथ को सावित्री के कमर के पास चड्डी के अंदर उंगली डाल कर निकालने के लिए सरकाना सुरू करने वाले थे कि सावित्री समझ गयी कि अब चड्डी निकालना है तो चड्डी काफ़ी कसी होने के नाते वह खुद ही निकालने के लिए उनकी गोद से ज्योन्हि उठना चाही पंडित जी ने उसका कमर पकड़ कर वापस गोद मे बैठा लिए और धीरे से बोले "रूको आज मैं तुम्हारी चड्डी निकालूँगा,,, थोड़ा मेरे से अपनी कसी हुई चड्डी निकलवाने का तो मज़ा लेलो." सावित्री पंडित जी के गोद मे बैठने के बाद यह सोचने लगी कि कहीं आज चड्डी फट ना जाए. फिर पंडित जी चड्डी के किनारे मे अपनी उंगली फँसा कर धीरे धीरे कमर के नीचे सरकाने लगे. चड्डी काफ़ी कसी होने के वजह से थोड़ी थोड़ी सरक रही थी. सावित्री काफ़ी मदद कर रही थी कि उसकी चड्डी आराम से निकल जाए. फिर सावित्री ने अपने चूतादो को हल्के सा गोद से उपर कर हवा मे उठाई लेकिन पंडित जी चूतड़ की चौड़ाई और चड्डी का कसाव देख कर समझ गये कि ऐसे चड्डी निकल नही पाएगी. क्योंकि कमर का हिस्सा तो कुछ पतला था लेकिन नीचे चूतड़ काफ़ी चौड़ा था. फिर उन्होने सावित्री को अपने गोद मे से उठकर खड़ा होने के लिए कहा "चल खड़ी हो जा तब निकालूँगा चड्डी .....तेरा चूतड़ का हिस्सा बड़ा चौड़ा है रे .....लगता है किसी हथिनी का चूतड़ है..." इतना सुनते ही सावित्री उठकर खड़ी हो गयी और फिर पंडित जी उसकी चड्डी निकालने की कोशिस करने लगे. चड्डी कोशिस के बावजूद बस थोड़ी थोड़ी किसी तरह सरक रही थी. पंडित जी धोती और ढीले लंगोट मे चटाई पर बैठे ही चड्डी निकाल रहे थे. सावित्री का चौड़ा चूतड़ पंडित जी के मुँह के ठीक सामने ही था. जिस पर चड्डी आ कर फँस गयी थी. जब पंडित जी चड्डी को नीचे की ओर सरकाते तब आगे यानी सावित्री के झांट और बुर के तरफ की चड्डी तो सरक जाती थी लेकिन जब पिछला यानी सावित्री के चूतदों वाले हिस्से की चड्डी नीचे सरकाते तब चूतदों का निचला हिस्सा काफ़ी गोल और मांसल होकर बाहर निकले होने से चड्डी जैसे जैसे नीचे आती वैसे वैसे चूतड़ के उभार पर कस कर टाइट होती जा रही थी. आख़िर किसी तरह चड्डी नीचे की ओर आती गयी और ज्योन्हि चूतदों के मसल उभार के थोड़ा सा नीचे की ओर हुई कि तुरंत "फटत्त" की आवाज़ के साथ चड्डी दोनो बड़े उभारों से नीचे उतर कर जाँघ मे फँस गयी. चड्डी के नीचे होते ही सावित्री के काले और काफ़ी बड़े दोनो चूतदों के गोलाइयाँ अपने पूरे आकार मे आज़ाद हो कर हिलने लगे. मानो चड्डी ने इन दोनो चूतदों के गोलाईओं को कस कर बाँध रखा था. चूतदों के दोनो गोल गोल और मांसल हिस्से को पंडित जी काफ़ी ध्यान से देख रहे थे. सावित्री तो साँवले रंग की थी लेकिन उसके दोनो चूतड़ कुछ काले रंग की थी. चूतड़ काफ़ी कसे हुए थे. चड्डी के नीचे सरकते ही सावित्री को राहत हुई कि अब चड्डी फटने के डर ख़त्म हो गया था. फिर पंडित जी सावित्री के जांघों से चड्डी नीचे की ओर सरकाते हुए आख़िर दोनो पैरों से निकाल लिए. निकालने के बाद चड्डी के बुर के सामने वाले हिस्से को जो की कुछ भीग गया था उसे अपनी नाक के पास ले जा कर उसका गंध नाक से खींचे और उसकी मस्तानी बुर की गंध का आनंद लेने लगे. चड्डी को एक दो बार कस कर सूंघने के बाद उसे फर्श पर पड़े सावित्री के कपड़ों के उपर फेंक दिए. अब सावित्री एकदम नंगी होकर पंडित जी के सामने अपना चूतड़ कर के खड़ी थी. फिर अगले पल पंडित जी चटाई पर उठकर खड़े हुए और अपनी धोती और लंगोट दोनो निकाल कर चौकी पर रख दिए. उनका लंड अब एकदम से खड़ा हो चुका था. पंडित जी फिर चटाई पर बैठ गये और सावित्री जो सामने अपने चूतड़ को पंडित जी की ओर खड़ी थी, फिर से गोद मे बैठने के बारे मे सोच रही थी कि पंडित जी ने उसे गोद के बजाय अपने बगल मे बैठा लिए. सावित्री चटाई पर पंडित जी के बगल मे बैठ कर अपनी नज़रों को झुकाए हुए थी. फिर पंडित जी ने सावित्री के एक हाथ को अपने हाथ से पकड़ कर खड़े तननाए लंड से सटाते हुए पकड़ने के लिए कहे. सावित्री पिच्छले दिन भी लंड को पकड़ चुकी थी. सावित्री ने पंडित के लंड को काफ़ी हल्के हाथ से पकड़ी क्योंकि उसे लाज़ लग रही थी. पंडित जी का लंड एकदम गरम और कड़ा था. सुपादे पर चमड़ी चड़ी हुई थी. लंड का रंग गोरा था और लंड के अगाल बगल काफ़ी झांटें उगी हुई थी. पंडित जी ने देखा की सावित्री लंड को काफ़ी हल्के तरीके से पकड़ी है और कुछ लज़ा रही है तब धीरे से बोले "अरे कस के पकड़ .. ये कोई साँप थोड़ी है कि तुम्हे काट लेगा.... थोड़ा सुपादे की चॅम्डी को आगे पीछे कर....अब तुम्हारी उमर हो गयी है ये सब करने की... थोड़ा मन लगा के लंड का मज़ा लूट" आगे बोले "पहले इस सूपदे के उपर वाली चॅम्डी को पीछे की ओर सरका और थोड़ा सुपादे पर नाक लगा के सुपादे की गंध सूंघ ...." सावित्री ये सब सुन कर भी चुपचाप वैसे ही बगल मे बैठी हुई लंड को एक हाथ से पकड़ी हुई थी और कुछ पल बाद कुछ सोचने के बाद सुपादे के उपर वाली चमड़ी को अपने हाथ से हल्का सा पीछे की ओर खींच कर सरकाना चाही और अपनी नज़रे उस लंड और सूपदे के उपर वाली चमड़ी पर गढ़ा दी थी. बहुत ध्यान से देख रही थी कि लंड एक दम साँप की तरह चमक रहा था और सुपादे के उपर वाली चमड़ी सावित्री के हाथ की उंगलिओ से पीछे की ओर खींचाव पा कर कुछ पीछे की ओर सर्की और सुपादे के पिछले हिस्से पर से ज्योन्हि पीछे हुई की सुपादे के इस काफ़ी चौड़े हिस्से से तुरंत नीचे उतर कर सुपादे की चमड़ी लंड वाले हिस्से मे आ गयी और पंडित जी के लंड का पूरा सुपाड़ा बाहर आ गया जैसे कोई फूल खिल गया हो और चमकने लगा. ज्योन्हि सुपाड़ा बाहर आया कि पंडित जी सावित्री से बोले "देख इसे सूपड़ा कहते हैं और औरत की बुर मे सबसे आगे यही घुसता है, अब अपनी नाक लगा कर सूँघो और देखा कैसी महक है इसकी" "इसकी गंध सूँघोगी तो तुम्हारी मस्ती और बढ़ेगी चल सूंघ इसे" सावित्री ने काफ़ी ध्यान से सुपादे को देखा लेकिन उसके पास इतनी हिम्मत नही थी कि वह सुपादे के पास अपनी नाक ले जाय. तब पंडित जी ने सावित्री के सिर के पीछे अपना हाथ लगा कर उसके नाक को अपने लंड के सुपादे के काफ़ी पास ला दिया लेकिन सावित्री उसे सूंघ नही रही थी. पंडित जी ने कुछ देर तक उसके नाक को सुपादे से लगभग सटाये रखा तब सावित्री ने जब साँस ली तब एक मस्तानी गंध जो की सुपादे की थी, उसके नाक मे घुसने लगी और सावित्री कुछ मस्त हो गयी. फिर वह खुद ही सुपादे की गंध सूंघने लगी. और ऐसा देख कर पंडित जी ने अपना हाथ सावित्री के सिर से हटा लिया और उसे खुद ही सुपाड़ा सूंघने दिया और वह कुछ देर तक सूंघ कर मस्त हो गयी. फिर पंडित जी ने उससे कहा "अब सुपादे की चमड़ी को फिर आगे की ओर लेजा कर सुपादे पर चढ़ा दो" यह सुन कर सावित्री ने अपने हाथ से सुपादे के चमड़ी को सुपादे के उपर चढ़ाने के लिए आगे की ओर खींची और कुछ ज़ोर लगाने पर चमड़ी सुपादे के उपर चढ़ गयी और सुपादे को पूरी तरीके से ढक दी मानो कोई नाप का कपड़ा हो जो सुपादे ने पहन लिया हो.

Sangharsh--14

savitri ke munh me pandit ji ka thuk jaate hi uske shareer me ashleelta aur vasna ka ek naya tej nasha hona suru ho gayaa. mano pandit ji ne savitri ke munh me thuk nahi balki koi nasheela cheez dal diya ho. savitri madhosi ki halat me apne salwaar ke upar se hi bur ko bheench liya. pandit ji savitri ki yah harkat dekhte samajh gaye ki ab bur ki fanken fadfadaa rahi hain. dusre pal pandit ji ke haath savitri ke salwaar ke jarvan par pahunch kar jarvan ki gaanth kholne laga. lekin pandit ji ki god me baithi savitri ke salwaar ki ganth kuch kasaa bandhe hone se khul nahi paa rahaa tha.. aisa dekhte hi savitri pandit ji ki god me baithe hi baithe apne dono haath jarvan par lejakar pandit ji ke hath ki unglion ko hataa kar khud hi jarvan ki gaanth kholne lagin. aisa dekh kar pandit ji ne apne haath ko jarvan ki ganth ke thoda dur kar ke savitri ke dwara jarvan ko khul jaane ka intjaar karne lage. agle pal arvan ki ganth savitri ke dono hathon ki unglian khol di aur fir savitri ke dono haath alag alag ho gaye. yah dekh kar pandit ji samajh gaye ki aage ka kaam unka hai kyonki savitri salwaar ke jarvan ke ganth khulte hi hath hataa lene ka matalab tha ki vah khud salwaar nahi nikalna chahti thi. shayad laaz ke karan. fir savitri ka haath hatate hi pandit ji apne hath ko salwaar ke jarvan ko uske kamar me se dheela karane lage. pandit ji ke god me baithi savitri ke kamar me salwaar ke dheele hote hi salwaar kamar ke kuch niche hua to god me baithi savitri ki chaddi ka upari hissa dikhne lagaa. fir pandit ji agle pal jyonhi savitri ki salwaar ko nikalne ki koshis karna suru kiye ki savitri ne apne chaude chutadon ko god me se kuch upar ki or hawaa me utha di aur mauka dekhte hi pandit ji salwaar ko savitri ke chutadon ke niche se sarkaakar uske pairon se hote huye nikaal kar farsh par fenk diye. ab fir keval chaddi me savitrii apne bade bade aur kaale chutadon ko pandit ji ke god me baith gayi. savitri ke dono chutad chaude hone ke naate kafi bade bade lag rahe the aur faile se gaye the. jis andaaz me savitri baithi thi usase uski lund ki bhookh ekdam saaf dikh rahi thi. chehre par jo bhav the vah uske besharmi ko bataa rahe the. shayad pichle din jo chudai ka mazaa mila tha vahi mazaa fir lena chah rahi thi. ab savitri ki sanse aur tej chal rahi thin. . salwaar hatate hi savitri ke janghen bhi nangi ho gayi jispar pandit ji ki nazar aur haath fislne lage. savitri ki janghen kafi mansal aur gol gol sanwale rang ki thi. lekin bur ke paas ke jangh ka hissa kuch jyada hi sanwlaa tha. pandit ji savitri ke nangi aur mansal sanwle rang ki janghon ko aaj kafi dhyaan se dekh rahe the. attharah saal ki savitri jo ki pandit ji ke god me aise baithi thi mano ab pandit ji ke god se uthna nahi chahti ho. pandit ji ka lund bhi dhoti ke andar dheele langot me khadaa ho chuka tha. jiska kadaapan aur chubhan keval chaddi me baithi savitri apne kaale chutadon me araam se mahsoos kar rahi thi. fir bhi bahut hi aaraam se ek chudail aurat ki tarah apne dono chutadon ko unke god me pasaar kar baithi thi. pandit ji savitri ko god me baithaye huye uski nangi gol gol chuchion par haath ferte huye kafi dheere se puchha "mazaa paa rahi ho na" is par savitri ne dheere se boli "jee". aur agle pal apni sir kuch niche jhuka li. sanse kuch tej le rahi thi. lekin pandit ji ne dheere se fir puchha "tumhe kabhi koi chodne ki koshis nahi kee thi kyaa,,, tere gaon me to bahut saare awara hain." is sawaal par savitri ne kuch jabab nahi diya balki apni nazre jhukaaye hi rahi. "goan me idher udher ghumne firne nahi jaati thi kyaa" pandit ji ne dubaara dheere se puchha to savitri ne nahi me sir hilaaya to pandit ji bole "ghar par hi padi rahti thi isi vajah se bachi rahi nahi to ghar se bahar kadam rakhi hoti to aaj ke mahaul turant chud jaati., vaise tere gaon me awaare bhi bahut jyade hain..... teri maa bechari bhi kuch nahi kar pati un badmashon ka aur we sab tere ko chod chod kar gaon ki kuttiyaa bana dete." pandit ji apne god me baithi hui savitri ke janghon par haath ferte huye fir bole "bechari teri maa apni hifajat kar le vahi bahut hai nahi to vidhvaa bechaari ka kahin bhi pair fisla to gaon ke lofaron aur awaron ke lund ke niche dabte der nahi lagegi." aage fir bole "aur awaron ke lund ka pani bahut jyade hi nasheela hota hai" aage fir bole "aur jis aurat ko aware chod kar uski bur me apne lund ka nasheela pani giraa dete hain vah aurat apne jeevan me sudhar nahi sakti,...aur ek pakki chudail ban hi jaati hain, samajhi....... tum bhi bach ke rahna in awaaron se, .....inke lund ka pani bahut tej hota hai" pandit ji savitri ke chaddi ke upar se hi bur ko meezte huye yah sab baaten dheere dheere bol rahe the aur savitri sab chup chap sun rahi thi. vah gahri gahri sansen le rahi thi aur nazren jhukaye huye thi. pandit ji ki baaten sun rahi savitri khoob acchi tarah samajh rahi thi ki pandit ji kin awaaron ki baat kar rahen hain. lekin vah nahi samajh paa rahi thi ki awaron ke lund ka pani me kaun sa nashaa hota hai jo aurat ko chhinaar ya chudail banaa deta hai. vaise savitri to bas pichle din hi kisi mard ke lund ka pani apni bur me girataa mahsoos ki thi jo ki pandit ji ke lund ka tha. pandit ji yah sab bataa kar use awaron se dur rahne ki hidayat aur salaah de rahe the. shavitri ko pandit ji ki yah sab baaten keval ek salaah lag rahi thi jabki vastav me pandit ji ke man me yah dar tha ki ab savitri ko lund ka swaad mil chukaa hai aur vah kafi garm bhi hai. aise me yadi ko gaon ke awaare mauka paa ke savitri ka ragadadaar chudai kar denge to savitri keval pandit ji se chudte rahnaa utnaa pasand nahi karegi aur apne gaon ke awaare lundon ke chakkar me idher udher ghumati firti rahegi. jisase ho sakta hai ki pandit ji ke dukaan par aana jana bhi band kar de. isi vajah se pandit ji bhi awaaron se bachne ki salaah de rahe the. bur ko chaddi ke upar se sahlaate huye jab bhi bur ke chhed wale hisse par ungli jati to chaddi ko chhed wala hissa bur ke ras se bheege hone se pandit ji ki ungli bhi bheeg jaa rahi thi. pandit ji jab yah dekhe ki savitri ki bur ab bah rahi hai to uski chaddi nikaalne ke liye apne haath ko savitri ke kamar ke paas chaddi ke ander ungali daal kar nikaalna ke liye sarkaana suru karne wale the ki savitri samjh gayi ki ab chaddi nilaalna hai to chaddi kafi kasi hone ke naate vah khud hi nikaalne ke liye unki god se jyonhi uthna chahi pandit ji ne uska kamar pakad kar vaapas god me baitha liye aur dheere se bole "ruko aaj main tumhaari chaddi nikaalunga,,, thoda mere se apni kasi hui chaddi nikalwaane ka to mazaa lelo." savitri pandit ji ke god me baithne ke baad yah sochne lagi ki kahin aaj chaddi fat na jaye. fir pandit ji chaddi ke kinaare me apni ungli fansa kar dheere dheere kamar ke niche sarkaane lage. chaddi kafi kasi hone ke vajah se thodi thodi sarak rahi thi. savitri kafi madad kar rahi thi ki uski chaddi aaraam se nikal jaye. fir savitri ne apne chutado ko halke sa god se upar kar hawaa me uthai lekin pandit ji chutad ki chaudai aur chaddi ka kasaav dekh kar samajh gaye ki aise chaddi nikal nahi payegi. kyonki kamar ka hissa to kuch patla tha lekin niche chutad kafi chauda tha. fir unhone savitri ko apne god me se uthkar khada hone ke liye kaha "chal khadi ho jaa tab nikaalunga chaddi .....tera chutad ka hissa badaa chauda hai re .....lagta hai kisi hathini ka chudad hai..." itna sunte hi savitri uthkar khadi ho gayi aur fir pandit ji uski chaddi nikaalne ki koshis karne lage. chaddi koshis ke bavjood bas thodi thodi kisi tarah sarak rahi thi. pandit ji dhoti aur dheele langot me chatai par baithe hi chaddi nikal rahe the. savitri ka chauda chutad pandit ji ke munh ke theek samne hi tha. jis par chaddi aa kar fans gayi thi. jab pandit ji chaddi ko niche ki or sarkaate tab aage yani savitri ke jhant aur bur ke taraf ki chaddi to sarak jaati thi lekin jab pichla yani savitri ke chutadon waale hisse ki chaddi niche sarkaate tab chutadon ka nichlaa hissa kafi gol aur mansal hokar baahar nikle hone se chaddi jaise jaise niche aati vaise vaise chudaon ke ubhaar par kas kar tight hoti ja rahi thi. akhir kisi tarah chaddi niche ki or aati gayi aur jyonhi chutadon ke masal ubhar ke thoda sa niche ki or huyi ki turant "fattt" ki awaaj ke sath chaddi dono bade ubhaaron se niche utar kar jangh me fans gayi. chaddi ke niche hote hi savitri ke kaale aur kafi bade dono chutadon ke golaian apne pure aakaar me azaad ho kar hilne lage. mano chaddi ne in dono chutadon ke golaion ko kas kar bandh rakha tha. chutadon ke dono gol gol aur mansal hisse ko pandit ji kafi dhyaan se dekh rahe the. savitri to sanwale rang ki thi lekin uske dono chutad kuch kaale rang ki thin. chutadon kafi kase huye the. chaddi ke niche sarkte hi savitri ko raahat hui ki ab chaddi fatne ke dar khatm ho gayaa tha. fir pandit ji savitri ke janghon se chaddi niche ki or sarkaate huye akhir dono pairon se nikaal liye. nikaalne ke baad chaddi ke bur ke samne wale hisse ko jo ki kuch bheeg gayaa tha use apni naak ke paas le ja kar uska gandh naak se kheenche aur uski mastani bur ki gandh ka anand lene lage. chaddi ko ek do baar kas kar sunghne ke baad use farsh par pade savitri ke kapadon ke upar fenk diye. ab savitri ekdam nangi hokar pandit ji ke saamne apna chutad kar ke khadi thi. fir agle pal pandit ji chatai par uthkar khade huye aur apni dhoti aur langot dono nikaal kar chauki par rakh diye. unka lund ab ekdam se khadaa ho chukaa tha. pandit ji fir chataai par baith gaye aur savitri jo samne apne chutad ko pandit ji ki or khadi thi, fir se god me baithne ke baare me soch rahi thi ki pandit ji ne use god ke bajaay apne bagal me baitha liye. savitri chatai par pandit ji ke bagal me baith kar apni nazron ko jhukaye huye thi. fir pandit ji ne savitri ke ek haath ko apne haath se pakad kar khade tannaye lund se sataate huye pakadne ke liye kahe. savitri pichhle din bhi lund ko pakad chuki thi. savitri ne pandit ke lund ko kafi halke haath se pakdi kyonki use laaz lag rahi thi. pandit ji ka lund ekdam garam aur kadaa tha. supaade par chamadi chadi hui thi. lund ka rang gora tha aur lund ke agal bagal kafi jhanten ugi hui thin. pandit ji ne dekha ki savitri lund ko kafi halke tareeke se pakadi hai aur kuch laza rahi hai tab dheere se bole "are kas ke pakad .. ye koi saanp thodi hai ki tumhe kaat legaa.... thoda supaade ki chamdi ko aage piche kar....ab tumhari umar ho gayi hai ye sab karne ki... thoda man lagaa ke lund ka mazaa loot" aage bole "pahle is supade ke upar wali chamdi ko piche ki or sarkaa aur thoda supaade par naak lagaa ke supaade ki gandh soongh ...." savitri ye sab sun kar bhi chupchap vaise hi bagal me baithi huyi lund ko ek hath se pakadi hui thi aur kuch pal baad kuch sochne ke baad supaade ke upar wali chamadi ko apne hath se halka sa piche ki or kheench kar sarkaana chahi aur apni nazre us lund aur supade ke upar wali chamadi par gadaa di thi. bahut dhyaan se dekh rahi thi ki lund ek dam saanp ki tarah chamak rahaa tha aur supaade ke upar wali chamadi savitri ke haath ki unglion se piche ki or kheenchav paa kar kuch piche ki or sarki aur supaade ke pichle hisse par se jyonhi piche hui ki supaade ke is kafi chaude hisse se turan niche utar kar supaade ki chamadi lund wale hisse me aa gayi aur pandit ji ke lund ka pura supaada baahar aa gaya jaise koi phool khil gayaa ho aur chamakne lagaa. jyonhi supaada baahar aaya ki pandit ji savitri se bole "dekh ise supadaa kahte hain aur aurat ki bur me sabse aage yahi ghusta hai, ab apni naak lagaa kar sungho aur dekha kaisi mahak hai iski" "iski gandh sunghogi to tumhari masti aur badhegi chal soongh ise" savitri ne kafi dhyaan se supaade ko dekha lekin uske paas itani himmat nahi thi ki vah supaade ke paas apni naak le jaay. tab pandit ji ne savitri ke sir ke picche apna haath lagaa kar uske naak ko apne lund ke supaade ke kafi paas laa diya lekin savitri use soongh nahi rahi thi. pandit ji ne kuch der tak uske naak ko supaade se lagbhag sataaye rakha tab savitri ne jab saans lee tab ek mastaani gandh jo ki supaade ki thi, uske naak me ghusne lagi aur savitri kuch mast ho gayi. fir vah khud hi supaade ki gandh sunghne lagi. aur aisa dekh kar pandit ji ne apna haath savitri ke sir se hataa liya aur use khud hi supaada sunghne diya aur vah kuch der tak soongh kar mast ho gayi. fir pandit ji ne usase kahaa "ab supaade ki chamadi ko fir aage ki or lejaa kar supaade par chadaa do" yah sun kar savitri ne apne haath se supaade ke chamadi ko supaade ke upar chadhane ke liye aage ki or khinchi aur kuch jor lagaane par chamadi supaade ke upar chad gayi aur supaade ko puri tareeke se dhak di maano koi naap ka kapadaa ho jo supaade ne pahan liya ho


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 15 Dec 2014 03:58

संघर्ष--15

पंडित जी ने देखा की सावित्री लंड को काफ़ी ध्यान से अपने हाथ मे लिए हुए देख रही थी. और उन्होने ने उसे दिखाने के लिए थोड़ी देर तक वैसे ही पड़े रहे और उसके साँवले हाथ मे पकड़ा गया गोरा लंड अब झटके भी ले रहा था. फिर बोले "चमड़ी को फिर पीछे और आगे कर के मेरे लंड की मस्ती बढ़ा कि बस ऐसे ही बैठी रहेगी...अब तू सयानी हो गयी है और तेरी मा तेरी शादी भी जल्दी करेगी .... तो लंड से कैसे खेला जाता है कब सीखेगी.... और मायके से जब ये सब सिख कर ससुराल जाएगी तब समझ ले कि अपने ससुराल मे बढ़े मज़े लूटेगी और तुम्हे तो भगवान ने इतनी गदराई जवानी और शरीर दिया है कि तेरे ससुराल मे तेरे देवर और ससुर का तो भाग्य ही खूल जाएगा." "बस तू ये सब सीख ले की किसी मर्द से ये गंदा काम कैसे करवाया जाता है और शेष तो भगवान तेरे पर बहुत मेरहबान है..." पंडित जी बोले और मुस्कुरा उठे. सावित्री ये सब सुन कर कुछ लज़ा गयी लेकिन पंडित जी के मुँह से शादी और अपने ससुराल की बात सुनकर काफ़ी गर्व महसूस की और थोड़ी देर के लिए अपनी नज़रें लंड पर से हटा कर लाज़ के मारे नीचे झुका ली लेकिन अपने एक हाथ से लंड को वैसे ही पकड़े रही. पंडित जी ने देखा की सावित्री भी अन्य लड़कियो की तरह शादी के नाम पर काफ़ी खुश हो गयी और कुछ लज़ा भी रही थी. तभी सावित्री के नंगे काले काले मासल चूतदों पर हाथ फेरते वो आगे धीरे से बोले "अपनी शादी मे मुझे बुलाओगी की नही" ग़रीब सावित्री ने जब पंडित जी के मुँह से ऐसी बात सुनी तो उसे खुशी का ठिकाना ही नही रहा और नज़ारे झुकाए ही हल्की सी मुस्कुरा उठी लेकिन लाज़ के मारे कुछ बोल नही पाई और शादी के सपने मन मे आने लगे तभी पंडित जी ने फिर बोला "बोलो ..बुलाओगी की नही..." इस पर सावित्री काफ़ी धीरे से बोली "जी बुलाउन्गि" और एकदम से सनसना गयी. क्योंकि पंडित जी का लंड उसके हाथ मे भी था और वह एकदम से नंगी पंडित जी के बगल मे बैठी थी और उसके चूतदों पर पंडित जी का हाथ मज़ा लूट रहा था. ऐसे मे शादी की बात उठने पर उसके मन मे उसके होने वाले पति, देवर, ससुर, ननद, सास और ससुराल यानी ये सब बातों के सपने उभर गये इस वजह से सावित्री लज़ा और सनसना गयी थी. पंडित जी की इन बातों से सावित्री बहुत खुश हो गयी थी. किसी अन्य लड़की की तरह उसके मन मे शादी और ससुराल के सपने तो पहले से ही थे लेकिन पंडित जी जैसे बड़ा आदमी ग़रीब सावित्री के शादी मे आएगा उसके लिए यह एक नयी और गर्व वाली बात थी. शायद यह भी उसके सपनों मे जुड़ गया. इस वजह से अब उसका आत्म विश्वाह भी बढ़ गया और लंड को थामे थामे ही वह शादी के सपने मे डूबने लगी तभी पंडित जी ने कहा "तेरी मा बुलाए या नही तू मुझे ज़रूर बुलाना मैं ज़रूर आउन्गा ...चलो लंड के चमड़ी को अब आगे पीछे करो और लंड से खेलना सीख लो...." कुछ पल के लिए शादी के ख्वाबों मे डूबी सावित्री वापस लंड पर अपनी नज़रे दौड़ाई और सुपादे की चमड़ी को फिर पीछे की ओर खींची और पहले की तरह सुपाड़ा से चमड़ी हटते ही खड़े लंड का चौड़ा सुपाड़ा एक दम बाहर आ गया. सावित्री की नज़रे लाल सूपदे पर पड़ी तो मस्त होने लगी. लेकिन उसके मन मे यह बात बार बार उठ रही थी कि क्या पंडित जी उसकी शादी मे आएँगे, वह इतनी ग़रीब है तो उसके शादी मे कैसे आएँगे? यदि आएँगे तो कितनी इज़्ज़त की बात होगी उसके लिए.. यही सोच रही थी और सुपादे की चमड़ी को आगे पीछे करना सुरू कर दी और सोचते सोचते आख़िर हिम्मत कर के पूछ ही लिए "सच मे आएँगे" और पंडित जी के जबाव मिलने से पहले अपनी नज़रें लंड पर से हटा कर नीचे झुका ली लेकिन लंड पर सावित्री का हाथ वैसे ही धीरे धीरे चल रहा था और खड़े लंड की चमड़ी सुपादे पर कभी चढ़ती तो कभी उतरती थी. इतना सुन कर पंडित जी ने अपने एक हाथ से उसके चूतड़ और दूसरे हाथ मे एक चुचि को ले कर दोनो को एक साथ कस कर मसल्ते हुए बोले "क्यो नही आउन्गा ....ज़रूर ऑंगा तेरी शादी मे...." फिर पंडित जी के दोनो हाथों से चूतड़ और चुचि को कस कर मीज़ना सुरू किए और आगे बोले "मैं तेरे मर्द से भी मिल कर कह दूँगा कि तुम्हे ससुराल मे कोई तकलीफ़ नही होनी चाहिए....आज का जमाना बहुत खराब हो गया है साले दहेज और पैसे के लालच मे शादी के बाद लड़की को जला कर मार डालते हैं और तेरी मा बेचारी बिध्वा है क्या कर सकती है यदि तेरे साथ कुछ गड़बड़ हो गया तो"" सावित्री के चुचिओ और चूतदों पर पंडित जी के हाथ कहर बरपा रहे थे इस वजह से उसके हाथ मे लंड तो ज़रूर था लेकिन वह तेज़ी से सुपादे की चमड़ी को आगे पीछे नही कर पा रही थी. वह यह सब सुन रही थी लेकिन अब उसकी आँखे कुछ दबदबाने जैसी लग रही थी. पंडित जी के सॉफ आश्वासन से कि वह उसकी शादी मे आएँगे, वह खुश हो गयी लेकिन उनकी दूसरी बात जो दहेज और ससुराल मे किसी आतायाचार से था, कुछ डर सी गयी. लेकिन पंडित जी की इस बात की वह उसके मर्द और ससुराल वालों को यह इशारा कर देंगे की उसके साथ ऐसा कुछ नही होना चाहिए, सावित्री को संतुष्टि मिल गयी थी. अब चूतदों और चुचिओ के मीसाव से मस्त होती जा रही थी. फिर पंडित जी बोले "और मेरे ही लंड से तुम एक लड़की से औरत बनी हो.. तो मेरे ही सामने शादी के मंडप तुम किसी की पत्नी बनोगी तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा क्योंकि मैं ये तो देख लूँगा के मैने जिसकी सील तोड़ी उसकी सुहागरात किसके साथ मनेगि......सही बात है कि नही"" इतना कह कर पंडित जी मुस्कुरा उठे और आगे बोले "लंड तो देख लिया, सूंघ लिया और अब इसे चाटना और चूसना रह गया है इसे भी सीख लो...चलो इस सुपादे को थोड़ा अपने जीभ से चॅटो..." "आज तुम्हे इतमीनान से सब कुछ सीखा दूँगा ताकि ससुराल मे तुम एक गुणवती की तरह जाओ और अपने गुनो से सबको संतुष्ट कर दो. " फिर आगे बोले " चलो जीभ निकाल कर इस सुपादे पर फिराओ..." क्रमशः...............

Sangharsh--15

pandit ji ne dekha ki savitri lund ko kafi dhyan se apne haath me liye huye dekh rahi thi. aur unhone ne use dekhne ke liye thodi der tak vaise hi pade rahe aur uske sanwle haath me pakda gayaa gora lund ab jhatake bhi le rahaa tha. fir bole "chamadi ko fir piche aur aage kar ke mere lund ki masti badhao ki bas aise hi baithi rahegi...ab tu sayaani ho gayi hai aur teri maa teri shaadi bhi jaldi karegi .... to lund se kaise khela jata hai kab sikhegi.... aur mayake se jab ye sab sikh kar sasuraal jayegi tab samajh le ki apne sasuraal me badhe maze lootegi aur tumhe to bhagvaan ne itni gadaraai jawaani aur shareer diyaa hai ki tere sasuraal me tere devar aur sasur ka to bhagya hi khool jayega." "bas tu ye sab sikh le ki kisi mard se ye ganda kaam kaise karvaya jata hai aur shes to bhagvaan tere par bahut merhbaan hai..." pandit ji bole aur muskuraa uthe. savitri ye sab sun kar kuch lazaa gayi lekin pandit ji ke munh se shaadi aur apne sasuraal ki baat sunkar kafi garv mahsoos ki aur thodi der ke liye apni nazaren lund par se hataa kar laaz ke maare niche jhukaa li lekin apne ek haath se lund ko vaise hi pakde rahi. pandit ji ne dekha ki savitri bhi anya ladkion ki tarah shaadi ke naam par kafi khush ho gayi aur kuch lazaa bhi rahi thi. tabhi savitri ke nange kaale kaale masnal chutadon par hath ferte hu aage dheere se bole "apni shaadi me mujhe bulaogi ki nahi" gareeb savitri ne jab pandit ji ke munh se aisi baat suni to use khushi ka thikaana hi nahi raha aur najare jhukaaye hi halki si muskura uthi lekin laaz ke maare kuch bol nahi paayi aur shaadi ke sapne man me aane lage tabhi pandit ji ne fir bola "bolo ..bulaogi ki nahi..." is par savitri kafi dheere se boli "jee bulaaungi" aur ekdam se sansanaa gayi. kyonki pandit ji ka lund uske haath me bhi tha aur vah ekdam se nangi pandit ji ke bagal me baithi thi aur uske chutadon par pandit ji ka haath mazaa loot rahaa tha. aise me shaadi ki baat uthne par uske man me uske hone wale pati, devar, sasur, nanad, saas aur sasuraal yani ye sab baaton ke sapne ubhar gaye is vajah se savitri lazaa aur sansanaa gayi thi. pandit ji ki in baaton se savitri bahut khush ho gayi thi. kisi anya ladki ki tarah uske man me shaadi aur sasuraal ke sapne to pahle se hi the lekin pandit ji jaise badaa adami gareeb savitri ke shaadi me aayega uske liye yah ek nayi aur garv wali baat thi. shayad yah bhi uske sapnon me jud gayaa. is vajah se ab uska aatm vishvaah bhi badh gayaa aur lund ko thame thame hi vah shaadi ke sapne me doobne lagi tabhi pandit ji ne kahaa "teri maa bulaaye ya nahi tu mujhe jaroor bulaana main jaroor aaunga ...chalo lund ke chamadi ko ab aage piche karo aur lund se khelna sikh lo...." kuch pal ke liye shaadi ke khwabon me doobi savitri vapas lund par apni nazre daudai aur supaade ki chamadi ko fir piche ki or kheenchi aur pahle ki tarah supaada se chamadi hatate hi khade lund ka chauda supaada ek dam baahar aa gayaa. savitri ki nazare lal supade par padi to mast hone lagi. lekin uske man me yah baat bar bar uth rahi thi ki kya pandit ji uski shaadi me aayenge, vah itni gareeb hai to uske shaadi me kaise aayenge? yadi aayenge to kitani izzat ki baat hogi uske liye.. yahi soch rahi thi aur supaade ki chamadi ko aage piche karna suru kar di aur sochte sochte akhir himmat kar ke puch hi liye "sach me aayenge" aur pandit ji ke jabav milne se pahle apni nazren lund par se hataa kar niche jhukaa li lekin lund par savitri ka haath vaise hi dheere dheere chal rahaa tha aur khade lund ki chamadi supaade par kabhi chadati to kabhi utarti thi. itna sun kar pandit ji ne apne ek haath se uske chutad aur dusre haath me ek chuchi ko le kar dono ko ek saath kas kar masalte huye bole "kyo nahi aaunga ....jaroor aaunga teri shaadi me...." fir pandit ji ke dono haathon se chutad aur chuchi ko kas kar meezna suru kiye aur aage bole "main tere mard se bhi mil kar kah dunga ki tumhe sasuraal me koi takleef nahi honi chahiye....aaj ka jamana bahut kharaab ho gayaa hai saale dahej aur paise ke laalach me shaadi ke bad ladkion ko jalaa kar maar daalte hain aur teri maa bechaari bidhva hai kya kar sakati hai yadi tere saath kuch gadbad ho gayaa to"" savitri ke chuchion aur chutadon par pandit ji ke haath kahar barpaa rahe the is vajah se uske haath me lund to jaroor tha lekin vah teji se supaade ki chamadi ko aage piche nahi kar paa rahi thi. vah yah sab sun rahi thi lekin ab uski aankhe kuch dabdabaane jaisi lag rahi thi. pandit ji ke saaf aashwasan se ki vah uski shaadi me ayenge, vah khush ho gayi lekin unki dusari baat jo dahej aur sasuraal me kisi atayachaar se tha, kuch dar see gayi. lekin pandit ji ki is baat ki vah uske mard aur sasuraal walon ko yah ishaara kar denge ki uske saath aisa kuch nahi hona chahiye, savitri ko santushti mil gayi thi. ab chutadon aur chuchion ke misaav se mast hoti jaa rahi thi. fir pandit ji bole "aur mere hi lund se tum ek ladki se aurat bani ho.. to mere hi saamne shaadi ke mandap tum kisi ki patni banogi to mujhe bahut achha lagega kyonki main ye to dekh lunga ke maine jiski seal todi uski suhagraat kiske saath manegi......sahi baat hai ki nahi"" itna kah kar pandit ji muskuraa uthe aur aage bole "lund to dkeh liya, soongh liya aur ab ise chaatna aur choosna rah gayaa hai ise bhi seekh lo...chalo is supaade ko thoda apne jeebh se chaato..." "aaj tumhe itminaan se sab kuch sikha dunga taaki sasuraal me tum ek gudvati ki tarah jaao aur apne gudo se sabko santusht kar do. " fir aage bole " chalo jeebh nikaal kar is supaade par firaao..."