संघर्ष

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rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 28 Dec 2014 03:49

सलवार और समीज़ पहन कर सावित्री भी चौकी के एक किनारे जैसे ही खड़ी हुई थी कि गुलाबी अपने एक हाथ से उस तौलिए को उठा कर सावित्री की ओर बढ़ाते बोली "..ले इससे बाबू जी का लॉडा तो पोन्छ दे....ले ठीक से पोंछ के सॉफ कर दे...." सावित्री एकदम सन्न रह गई लेकिन एक पल रुकने के बाद उस तौलिए को अपने हाथ मे थाम ली. ठाकुर साहेब की नज़रें सावित्री के उपर ही थी. फिर केवल पेटिकोट मे खड़ी गुलाबी भी अपनी ब्लाउज पहनने लगी. अपने ब्लाउज के बटन को बंद करते देखी तो सावित्री चुपचाप खड़ी थी. तब गुलाबी बोली "लंड सॉफ करने मे लाज़ लग रही है....और ..जब लंड का पानी तेरी बुर पी रही थी तब लाज़ नही लग रही थी...." इतना कह कर मुस्कुराते हुए अपनी साड़ी उठा कर पहनने लगी और कुछ आगे बोलती कि धन्नो ने सावित्री को कुच्छ डाँटते हुए अंदाज़ मे बोली "....पोंच्छ दे रे .....हरजाई....पोंच्छ दे बाबू जी के लंड को....मज़ा लेगी तू ...तो पोन्छेगा कौन..." इतना सुनकर एकबार फिर सावित्री लाज़ से पानी पानी हो गई और फिर मुरझा रहे लंड पर लगे वीर्य और रज को पोंच्छने लगी. फिर धन्नो आगे बोली "लंड को एक हाथ से पकड़ ले...तब ठीक से पोंच्छ पाएगी....ऐसे तो लंड इधेर उधेर हो जा रहा है...." तब सावित्री अपने एक हाथ से ठाकुर साहेब के लंड को पकड़ कर तौलिए से धीरे धीरे पोंच्छने लगी. झाडे लंड पर तौलिए की रगड़ से उठे हल्के दर्द से ठाकुर साहेब सी सी करने लगे. फिर पूरा लंड को पोंच्छ कर तौलिए को गुलाबी के इशारे पर उस कोठरी के कोने मे फेंक दी. तबतक गुलाबी भी साड़ी पहन कर तैयार हो चुकी थी.

उधेर ठाकुर साहेब अपने नंगे बदन पर अपनी धोती डाल कर चौकी पर सोने लगे. इधेर गुलाबी, धन्नो और सावित्री को ले कर अपने घर के लिए निकल पड़ी. जैसे ही दोनो के कदम उस कोठारी से बाहर पड़े कि गुलाबी और धन्नो दोनो आपस मे बातें करना सुरू कर दी. रास्ते पर सबसे आगे गुलाबी फिर धन्नो और सबसे पीछे सावित्री चल रही थी. गुलाबी बातें सुरू करते हुए बोली “धन्नो, जानती हो, ठाकुर साहेब की उमर जैसे जैसे बढ़ती जा रही है.....मानो उनकी जवानी और उफन रही है गरम दूध की तरह ....” तब गुलाबी के ठीक पीछे खेतों के मेध पर चल रही धन्नो पुछि “वो कैसे....?”

गुलाबी: “आरीए ये अधेड़....नई नवेली खोज रहा है....”

धन्नो: “तो तुम कौन सी बूढ़ी हो गई है....तू भी तो जवान ही है...” धन्नो मुस्कुराते बोली.

फिर जबाब मे गुलाबी बोली “आरीए हरजाई...ये बूढ़ा लॉधुआ की बेटी जमुनिया को चोद्ने के सपने देख रहा है...”

धन्नो: “लॉधुआ तो वही ना....जो तेरे घर के रास्ते मे पड़ता है...”

गुलाबी: “हाँ हाँ ..जिसका छ्होटा सा घर है...उस पतली गली मे...मेरे घर के रास्ते क्या....बगल मे ही समझ....पड़ोसी है मेरा....”

धन्नो: “उसकी बेटी कितने साल की है ....”

गुलाबी: “यही कोई...अट्ठारह...उन्नीस की होगी....”

धन्नो: “तो चढ़वा दे सांड़ को....हे हे हे ....पुराना सांड़ है..हुमच देगा...”

गुलाबी: “जमुनिया को फाँसना पड़ेगा...अभी हाथ मे नही आ रही है....”

धन्नो: “उसे लंड प्यारा नही है क्या....”

गुलाबी: “आरीए....तू भी क्या बात करती है....वो एकदम कोरी है रीए...अभी तक कोई मरद हाथ नही लगाया उसे”

धन्नो: “तो ठाकुर साहेब कैसे पीछे पद गये उसके....”

गुलाबी: “एक दिन मेरे घर आ रहे थे...रास्ते मे उसे देख लिए....तभी से...”

धन्नो: “देख लिए .....क्या देख लिए जो उनका मन डोल गया...”

गुलाबी: “ठाकुर साहेब को पतली कमर वाली लड़की चोद्ने का पुराना शौक है...और जमुनिया को तो देखी हो ना....कितनी दुबली पतली है....उसकी कमर तो मानो है ही नहीं....”

धन्नो: (कुच्छ सोच कर बोली) “ऊ अब समझी तुम उस दुबली पतली लड़की की बात कर रही हो जो तेरी गली मे खेला करती थी..”

गुलाबी: “हां रीए....मुझे तो डर लगता है कि ...यदि कस के चोद दिए तो उसकी कमर ही टूट जाएगी....”

धन्नो: “सच कहती है...वो तो बहुत दुबली है...लेकिन अपने ठाकुर साहेब को बोल देना समहाल के चोदेन्गे..”

गुलाबी: “बोलने से क्या होगा...ये मर्द सारे एक जैसे होते हैं...ताव मे आने पर बिना कस के चोदे मानेंगे थोड़ी..”

धन्नो: “अट्ठारह की हो गई है ना पूरी...”

गुलाबी: “अट्ठारह की क्या ...अब तो उन्नीस साल पूरे ही होने वले हैं....वो मेरी बेटी से बस तीन महीने छ्होटी है...तभी तो मैं कहती हूँ कि अभी भी बहुत पतली है...”

धन्नो: “छाती छूती है कि नही...”

गुलाबी: “छ्होटी छ्होटी ....उभार ले रही है ...लेकिन बहुत छ्होटी है...”

धन्नो: “तू सच कह रही है...कुँवारी ज़रूर होगी...”

गुलाबी: “हां रे...और क्या...कोई मर्द हाथ लगाया होता तो, भले ही दुबली पतली क्यों ना हो...चुचि तो भारी हो ही जाती मरद के हाथ का मीसाव पा के...”

धन्नो: “हूँ...सच कह रही है....तो लगवा दे ठाकुर साहेब का नंबर..सील वाली बुर पा कर ठाकुर साहेब मस्त हो जाएँगे...”

गुलाबी: “जमुनिया को फँसाने के लिए पीच्छले दो महीने से कोशिस कर रही हूँ....”

धन्नो: “तू तो पुरानी छिनार है...इतने समय मे तो फँस जानी चाहिए....”

गुलाबी: “साली बिचुक जाती है....कई बार बोली कि चलो खेत घुमा लाउ..लेकिन अभी तैयार नही हो रही है..”

धन्नो: “अरी तो उससे बातें कर...फुसला...मर्दों के बारे मे बता....”

गुलाबी: “हाँ री सब करती हूँ....पोखरे पर उसे साथ ले जा कर नहाती हूँ...”

धन्नो: “पोखरे पर नहाने जाती है क्या....”

गुलाबी: “हां ...मैं उसे फुसला कर रोज़ ही ले जाती हूँ...”

धन्नो: “तो ठीक तो है....अपनी बुर उसे दीखा दीखा के नहा...लंड बुर की बातें कर...”

गुलाबी: “अभी नई उमर की है...सो थोड़ा संकोच करती है...लेकिन मैं बुर तो उसे दीखा ही देती हूँ...इधेर उधेर करके...”

धन्नो: “तो देखती है...?”

गुलाबी: “हां....लेकिन..”

धन्नो: “लेकिन क्या?”

गुलाबी: “बड़ी लज़ाति है .....”

धन्नो: “तो बोलती नही कि....लज़ाति क्यों है मैं कोई मर्द थोड़ी हूँ...जो तेरे पास है वो मेरे पास है..”

इतनी बात बोलकर रास्ते पर गुलाबी के पीछे पीछे चल रही धन्नो हंस पड़ी. धन्नो के पीछे सावित्री चुपचाप चल रही थी और दोनो की बातें भी सुन रही थी. ठाकुर साहेब से चुद जाने से ठंढी हो गई थी. खेतों के बीच पतले मेधों पर दोनो के पीछे पीछे चलते हुए दोनो की रंगीन बातें सुनना सावित्री भी अच्च्छा लग रहा था.

क्रमशः………………………………………..

rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 28 Dec 2014 03:50

Sangharsh--41

gataank se aage..........

fir dhanno dhakko pe dhakka lagaa rahe thakur saaheb aur siskaar kar chodwa rahi savitri, dono ki or dekhte huye gulabi se boli "..lagta hai ki harjaai jaldi hi jhadegi ....puri ainth ainth ke lund kha rahi hai dekho...." fir gulabi boli "haan ab to khalkhalaa kar jhadegi...musar jaise lund se bur pura fenta gayaa hai ...lapasi ki tarah pura sanaa gai hai bur iski " dhanno ki bhi saanse ab tez ho chuki thi. kai baar bur ko apni saadi ke upar se khujulaa chuki thi. fir bur ko saadi ke upar se hi khujulaate lagbhag chillate huye savitri se boli "....jhadegi kya re .....jhadegi to bolna babu ji se...jhadati bur me hi lund ka paani girta hai to mazaa bahut aata hai...bataa dena ...babuji ain vakt par paani giraa kar khoob mazaa denge..." savitri ki kaali bur ko thakur saaheb khoob tezi se chodate rahe. kothri me bas savitri ki siskaarian aur aah re mai aah re baap goonj rahi thi. thakur saaheb apne injan ko full speed chalu kar diya tha. thodi hi der me savitri dhanno ki or chehra karke kuchh bolna chah rahi thi lekin tez chudai ke dhakke khaane se aankhe dhampi hui thi. dhanno samajh gai ki jhadane wali hai. fir tezi se chud kar siskaar aur chilla rahi savitri se chilla kar puchhi "...kya hai re bol....jhadegi kya....to bol de babu ji se..bol de.." thakur saaheb ke lund ka laal chauda supaada aur mota lund savitri ki kaali bur ke reshe reshe ko ragad ragad kar ekdam se laal kar diya tha. tez chudai mano bur ki nas nas ko hila kar rakh diya tha. fir savitri siskaariyon ke beech chilla kar boli "aaah ree maii aah ree baap ...ba baa babu ..babu ji...mora ....jhad... jhadi...laagat baay re maai...mora jhadi jaai ye babu ji....." itna sunate hi thakur saaheb samajh gaye ki ab sahi vakt aa gayaa hai veerypaat karne ka. tab tak gulabi bhi chilla kar thakur saaheb se boli "babu ji...laundiya puri taav me hai....mauka dekh ke maar do peechkaari...idher udhar naa ho babu ji ek dam theek mauke pe maaro.." thakur saaheb turant apne kandhe par se uske dono paanv neeche karke apni peeth par dono pairon ko tezi se karne lage, itna dekh kar turant hi gulabi aur dhanno dono hi savitri ke pair ko thakur saaheb ke peeth par rakhne lagi aur gulabi boli "aise kas le thakur saaheb ke kamar ko apne dono pairon se aur tere ye dono hath inke peeth par rahne chahiye...jhadate samay..." ye sab kuch bahut hi tezi se huye aur is samay savitri thakur saaheb ke sine se chipak kar siskaar rahi thi aur dono pairon se unke kamar ko kas lee thi. fir dhakkon par dhakke lagnaa suru ho gayaa. savitri ab ekdam jhadne ki kagaar par pahunch gai thi. uska munh pura khula hua tha, khule munh siskaarian mano rukane ka naam nahi le rahi thin. mai baap aah re baap chilla rahi thi. thakur saaheb apne lohe ki tarah sakht aur tannaye huye mote lund ko aur adhik veg se chod rahe the. dhakka itna tez tha ki kothri me chauki ki charcharaaht gunj rahi thi. dhanno aur gulabi dono ankhe phad phad kar dekh rahi thi. dono rah rah kar apni bur ko apne kapade ke upar se hi khujulaa bhi rahi thin. dono ki ankhen mano savitri aur thakur saaheb ke jhadane ka intjaarkar rahin thi. tabhi chauki me chit let kar tezi se chuda rahi savitri ne apne peeth ko kisi dhanush ki tarah chauki me utaan karte huye chutad ko pura chhitraa kar bur me sataasat lund lete huye chilla uthi "....aaareee maaaeeeee reee maaai......bbb b bb ba ba babu ji babuji....aahieee reee ab aab ab nikalat bb baay reeee baap ....." itna sunate hi gulabi chillati hui puchhi "...aree bol ree kaa nikalat baay....saaf saaf bol re kaa nikalat baa....." fir savitri chauki me chudaate huye puri ainth aur siskaarian leti jabaav me chilla kar boli "aaa hi re maai .....eee aree nikal gayeel ree baap re baap.....jhad gayeel ree maaieee ....ye babu ji mor jhadat baay ho babu ji....." tab gulabi chillate huye thakur saaheb se boli "...ye babu ji ....der mat kariye babu ji.....apne deh ki beez gaad do iske khet me ....babu ji aapan beez rop do .....gaad do ...iska khet ab iski paani se geela go gayaa hai ...." fir dusre pal aage boli " ye harjaai babu ji ki aulaad apne pet me le kar saare gaanv me ghumegi.....beizzat ho jaayegi babu ji....fulaa do iska pet shaadi ke pahle....kar deo pura badnaam yeh kar jawaani babu ji ....udel do ab babu ji" gulabi ek hi saans me sab kuchh bol gai. savitri jhadna jaise hi suru ki hi thi ki thakur saaheb ke pure shareer me ek tez jhatka suru ho gayaa. unke pure badam me jhatka aur ainthan suru hote hi thakur saaheb savitri ko chauki me kas ke daboch liye aur is baar unke munh se ek kampati huyi tez aazaj garajate huye nikali "...teri maa ko chodu...randi....le le aah aaaah le saali aah ....madherchod...le mera..." itni baat munh se khatm hui hi thi ki thakur saaheb apni puri taakat se savitri ko chauki me champane lage aur kas ke daboch liye. unke kamar ka hissa ab tezi se jhatkaa le rahaa tha. jhatkaa itna tez tha ki puri chauki hil jaa rahi thi. dhanno aur gulabi dono samajh gayin ki ab thakur saaheb jhadne jaa rahe the. thakur saaheb ki dono aalu ke samaan anduon me se gaada veerya ki moti dhar ab lund ki naliyon ki taraf apna rasta tay karna suru kar diya tha.

veerya ki gaadhi aur moti dhaar lund ki sankari nalion ko failaate huye lund ke munh ki or kisi tez chal se chalane wali railgaadi ki tarah daudne lagi. aur agle hi pal veerya ki ek moti aur gadhi dhaar lund ke munh par pahunch gai. thakur saaheb savitri ke upar chad kar use daboche huye hi apne lund ko uski jhad rahi bur me jad tak champe huye the. is vajah se lund ka supada ek dam savitri ki bur ke andar bachchedaani ke munh ke paas hi tha. isi vajah se jaise hi lund ke munh par aaya huya veerya ka ek gadha fabbaraa kisi peechkaari ki tarah lund ke ched se chhoota aur bachchedaani ke munh se takaraate huye pure bur ke andar manspeshion me pasar gayaa. veerya bachchedaani ke munh se aise takrai mano koi peechkaari ko deewal se sataakar kisi ne teji se maari ho aur saara peechkaari se nikalne wala sabkuchh deewal par fail gayaa ho. thakur saaheb ke lund se nikle veerya ki pahali dhaar jaise hi bur ke andar bachchedaani ke munh par tezi se takraayi, to tez takraahat aur veerya ki garmi savitri bardasht nahi kar saki aur thakur saaheb ke seene se puri taakat se chhipkali ki tarah chipak kar unke peeth ko apne dono hathon se samet li aur unke kamar ko apne dono pairon se jakadte huye apne munh ko puri taakat se chauda karte chilla uthi "....aaaa a aa a a a aa aaa h eeee ehhh eeh re maaai maaeee.......babu ji .....bada mazaa ....mazaa aawat ..baa re baap ...garam baay ree maai badaa garam baay....." itna sunate hi gulabi jhat se dhanno ki or dekhte dheeme se boli "..lund ka garam pani paa gai harjaai...." dhanno kuchh jabaav dene ke bajaay ek tez sans lee aur apni bur ko saadi ke upar se khujulaate huye apne nazren bur me puri tarah se dhansaaye huye lund par teekaaye rahi aur jhad rahe thakur saaheb ke jhatke le rahe kamar ko bhi ankhe fad fad ke dekh rahi thi. savitri ke munh se awaaz puri hote hote thakur saaheb ke lund se ek ke bad ek mota gadha veerya ka fabbara nikal nikal kar theek bachchedaani ke munh par gir rahaa tha. mano kisi bandook se ek ke bad ek goli chhoot rahi ho. har fabbare ko peechkari ki tarah chhodne wala thakur saaheb ka mota lund bhi apni puri lambai tak jhataka le le kar veerya udel rahaa tha. lund ke bur me samaa kar jhatka lene ko savitri ki bur ki manspeshiyan puri tarah se mahsoos kar rahin thin. dhanno aur gulabi bhi lund ke jhatke lene ko ek jhalak dekhne ke liye utaavly ho kar nazaren tikain thin. lekin lund jad tak pur me champe hone se bas thoda sa jhatka dekh paa rahin thi. ek ke bad ek tez veerya ke fabbaare ki bauchhar ke takraahat aur veerya ki garmi ko savitri bardasht nahi kar paa rahi thi. use saaf mahsoos ho rahaa tha ki uski bur ki tah me jo veerya thakur saaheb udel rahe hain wo kafi garam hai. aur jyade matra me udel bhi rahe hain. abhi adha hi veerya udele the ki chilla rahi savitri ko aisa lagaa mano ab uski bur veerya se bhar gai hai. lekin thakur saaheb ke lund ke chhed se veerya ka chhotna jaari rahaa. tabhi savitri ko lagaa ki ab bur ki gahraai me girne wala veerya bur ke baahar aane ki koshis kar rahaa hai. mano bur ke andar pure veerya ko samaa lene ki jagah khatm ho gai ho. tabhi savitri fir chilla uthi ".....bhar ....bhar gayiel re maai ....buria ...mori buriaa bhar gaiel...." itna sunte hi dhanno aur gulabi samajh gain ki bur thakur saaheb ki veerya se lablabaa chuki hai. akhir kuchh aur jhatka le kar thakur saaheb bhi bache khuche veerya ko bur ki talhati me utaar hi diya. aur fir puri tarah se jhad chuke thakur saaheb tez sans lete huye savitri par apni mazboot pakad ko halka kiye. tabhi savitri apne dono hathon ko thakur saaheb ke peeth par se hata lee aur dusre pal apne dono pairon ko unke kamar me dheeli karti hui alag kar lee. fir dono pairon ko unke peeth par se puri tarah se hataa kar unke kamar ke dono or, chauki par rakh lee. ab puri tarah se jhad chuki savitri bhi mano hanf rahi thi jaise kai kos dauk ke aayi ho. thakur saaheb bhi savitri ke dono janghon ke beech chauki par baith gaye. fir apne lund ko buri tarah chud chuki savitri ki kaali bur se baahar ki or apni kamar ko hila kar kheencha, to pukkk ke aawaz ke saath unka abhi bhi pura khadaa lund baahar aa gayaa. savitri ki jhanton se bhari huyi kaali bur ko chod kar baahar nikalaa hua thakur saaheb ka vishaal lund bahut hi bhayaanak lag rahaa tha. lund ke upar savitri ke bur se nikla raz aur lund se nikla hua veerya dono hi apas me mil kar puri lund par faile huye the. dusri hi pal thakur saaheb chud chuki bur par ek nazar daale, jiske munh par lislissa veerya aur kuch paani ki tarah cheez lagaa tha. jhad jaane ke baad savitri ke pure badan me sharm ki lahar daud gai thi. is vajah se jaise hi thakur saaheb uske dono janghon ke beech se hate ki savitri turant apne dono janghon ko apas me sataati hui chauki par ek taraf karvat leti hui uth kar dheere se chauki ke neeche apne dono paanv latkaa kar baith gai. tabtak thakur saaheb chauki par chit let gaye. dusre hi pal savitri jhat se chauki par se neeche utar kar khadi ho gai. uski nazren jhuki hui thi aur neeche pade apne kapadon ki or ek pal dekhi. fir kapade pahnane ke liye aage badhi. ye sab dekh kar garam ho chuki dhanno savitri se boli "...dekh to ...badaa naahi naahi kar rahi thi....kitnaa mazaa aaya is lund bur ke khel me...." itna sunkar savitri kuchh bhi boli nahi balki apne chaddhi ko pahnane ki soch rahi thi. tabhi use lagaa ki uski bur ke munh par chudai ka ras lagaa hai is liye wo agle hi pal apne chaddhi se dheere se ponchh lee. lekin nazren jhukaye hi thi. fir tabhi bur ke andar se veerya ris kar aa gayaa to use bhi ponchh lee. itna dekhkar gulabi boli " lund ka paani aa rahaa hoga teri bur se...le ye tauliyaa..aur theek se bur ponchh le....." itna bolkar gulabi ne ek chhoti si tauliya uski or badhai to savitri use tham lee aur bur ko theek se ponchne lagi. fir chaddhi ko pahan li aur fir thakur saaheb ki or peeth karke sir jhukaaye hi apni bra ko bhi pahan lee. dono chuchian bra ke andar kaste hi fir se ekdam tan gain. fir apni salwar ko pahan kar jaldi se nada bandh lee aur sameez ko apne dono banhon me baari baari se daal kar fir gale me dal kar pahan lee. chauki ke dusari or neeche gire dupatte ko bhi jaise hi uthane lagi ki gulabi dupatte ko savitri ke hath se chheen kar le lee aur boli "....ab kahe ko dupatta lagaa rahi hai...ab thakur saaheb se kaisa laaz reee....dekh to meri bhi to chuchi nangi hai...he he ." fir gulabi us dupatte ko thakur saaheb ke bagal me chauki par rakhte boli "chal jab jaana tab ise lagaa lena...abhi vaisi hi rah..." thakur saaheb chauki par vaise hi nidhaal hokar lete huye sab kuchh dekh aur sun rahe the lekin savitri ke bur me jhad jaane se kuchh mano thakaan bhi lag gai thi. vaise umar se thakur saaheb ek adhed ho chuke the. lekin chudai aaj bhi unhe vaise hi pasand thi jaise puri jawaani me pasand hua karti thi.

salwar aur sameez pahan kar savitri bhi chauki ke ek kinare jaise hi khadi huyi thi ki gulabi apne ek hath se us tauliye ko utha kar savitri ki or badhaate boli "..le isase babu ji ka lauda to ponchh de....le theek se ponch ke saaf kar de...." savitri ekdam sann rah gai lekin ek pal rukne ke baad us tauliye ko apne hath me tham lee. thakur saaheb ki nazren savitri ke upar hi thi. fir keval peticot me khadi gulabi bhi apni blauze pahane lagi. apne blauze ke bataam ko band karte dekhi to savitri chupchap khadi thi. tab gulabi boli "lund saaf karne me laaz lag rahi hai....aur ..jab lund ka paani teri bur pee rahi thi tab laaz nahi lag rahi thi...." itna kah kar muskurate huye apni saadi utha kar pahnane lagi aur kuch aage bolti ki dhanno ne savitri ko kuchh dantate huye andaaz me boli "....ponchh de re .....harjaai....ponchh de babu ji ke lund ko....mazaa legi tu ...to ponchhega kaun..." itna sunkar ekbar fir savitri laaz se paani paani ho gai aur fir murjhaa rahe lund par lage veerya aur raz ko ponchhne lagi. fir dhanno aage boli "lund ko ek hath se padak le...tab theek se ponchh paayegi....aise to lund idher udher ho jaa rahaa hai...." tab savitri apne ek hath se thakur saaheb ke lund ko pakad kar tauliye se dheere dheere ponchhne lagi. jhade lund par tauliye ki ragad se uthe halke dard se thakur saaheb see see karne lage. fir pura lund ko ponchh kar tauliye ko gulabi ke ishaare par us kothri ke kone me fenk dee. tabtak gulabi bhi saadi pahan kar taiyaar ho chuki thi.

rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 28 Dec 2014 03:50

udher thakur saaheb apne nange badan par apni dhoti daal kar chauki par sone lage. idher gulabi, dhanno aur savitri ko le kar apne ghar ke liye nikal padi. jaise hi dono ke kadam us kothari se baahar padi ki gulabi aur dhanno dono apas me baaten karna suru kar dee. rashte par sabse aage gulabi fir dhanno aur sabse peechhe savitri chal rahi thi. gulabi baaten suru karte huye boli “dhanno, janti ho, thakur saaheb ki umar jaise jaise badhti jaa rahi hai.....mano unki jawaani aur ufan rahi hai garam doodh ki tarah ....” tab gulabi ke theek peechhe kheton ke medh par chal rahi dhanno puchhi “wo kaise....?”

gulabi: “areee ye adhed....nai naveli khoj rahaa hai....”

dhanno: “to tum kaun si buddhi ho gai hai....tu bhi to jawaan hi hai...” dhanno muskuraate boli.

fir jabaab me gulabi boli “areee harjaai...ye buddhaa lodhua ki beti jamunia ko chodne ke sapne dekh rahaa hai...”

dhanno: “lodhua to wahi naa....jo tere ghar ke raste me padta hai...”

gulabi: “han han ..jiska chhota saa ghar hai...us patli gali me...mere ghar ke raste kya....bagal me hi samajh....padosi hai mera....”

dhanno: “uski beti kitne saal ki hai ....”

gulabi: “yahi koi...attharah...unnis ki hogi....”

dhanno: “to chadwaa de saandh ko....he he he ....purana saandh hai..humach degaa...”

gulabi: “jamunia ko faansna padega...abhi hath me nahi aa rahi hai....”

dhanno: “use lund pyara nahi hai kya....”

gulabi: “areee....tu bhi kya baat karti hai....wo ekdam kori hai reee...abhi tak koi marad hath nahi lagaya use”

dhanno: “to thakur saaheb kaise peechhe pad gaye uske....”

gulabi: “ek din mere ghar aa rahe the...rashte me use dekh liye....tabhi se...”

dhanno: “dekh liye .....kya dekh liye jo unka man dol gayaa...”

gulabi: “thakur saaheb ko patli kamar wali ladaki chodne ka purana shauk hai...aur jamunia ko to dekhi ho naa....kitni dubali patali hai....uski kamar to mano hai hi nahin....”

dhanno: (kuchh soch kar boli) “ooh ab samajhi tum us dubali patali ladaki ki baat kar rahi ho jo teri gali me khela karti thi..”

gulabi: “haan reee....mujhe to dar lagta hai ki ...yadi kas ke chod diye to uski kamar hi tut jaayegi....”

dhanno: “sach kahati hai...wo to bahut dubali hai...lekin apne thakur saaheb ko bol dena samhaal ke chodenge..”

gulabi: “bolne se kya hoga...ye mard saare ek jaise hote hain...taav me aane par bina kas ke chode maanenge thodi..”

dhanno: “attharah ki ho gai hai naa puri...”

gulabi: “attharag ki kya ...ab to unnis saal pure hi hone wale hain....wo meri beti se bas teen maheene chhoti hai...tabhi to main kahti hun ki abhi bhi bahut patli hai...”

dhanno: “chhaati ooti hai ki nahi...”

gulabi: “chhoti chhoti ....ubhar le rahi hai ...lekin bahut chhoti hai...”

dhanno: “tu sach kah rahi hai...kunwari jaroor hogi...”

gulabi: “haan re...aur kya...koi mard hath lagaya hota to, bhale hi dubali patli kyon naa ho...chuchi to bhaari ho hi jaati marad ke haath ka meesav paa ke...”

dhanno: “hun...sach kah rahi hai....to lagwa de thakur saaheb ka number..seal wali bur paa kar thakur saaheb mast ho jaayenge...”

gulabi: “jamunia ko fansane ke liye peechhle do maheene se koshis kar rahi hun....”

dhanno: “tu to purani chhinaar hai...itne samay me to fans jaani chahiye....”

gulabi: “saali bichuk jaati hai....kai baar boli ki chalo khet ghuma laaun..lekin abhi taiyaar nahi ho rahi hai..”

dhanno: “aree to usase baaten kar...fuslaa...mardon ke baare me bataa....”

gulabi: “ha ree sab karti hun....pokhre par use saath le jaa kar nahaati hun...”

dhanno: “pokhre par nahaane jaati hai kya....”

gulabi: “haan ...main use fusla kar roz hi le jaati hun...”

dhanno: “to theek to hai....apni bur use deekha deekha ke nahaa...lund bur ki baaten kar...”

gulabi: “abhi nai umar ki hai...so thoda sankoch karti hai...lekin main bur to use deekha hi deti hun...idher udher karke...”

dhanno: “to dekhti hai...?”

gulabi: “haan....lekin..”

dhanno: “lekin kya?”

gulabi: “badi lazaati hai .....”

dhanno: “to bolti nahi ki....lazaati kyon hai main koi mard thodi hun...jo tere paas hai wo mere paas hai..”

intni baat bolkar raste par gulabi ke peechhe peechhe chal rahi dhanno hans padi. dhanno ke peechhe savitri chupchap chal rahi thi aur dono ki baaten bhi sun rahi thi. thakur saaheb se chud jaane se thandhi ho gai thi. kheton ke beech patle medhon par dono ke peechhe peechhe chalte huye dono ki rangeen baaten sunana savitri bhi achchha lag rahaa tha.

Kramashah………………………………………..